इस साल मुंबई में होने वाले काला घोड़ा फेस्टीवल में मैंने पहली बार ग्रीनसोल का नाम सुना और उनके प्रोडक्टस को देखा। हालांकि मुझे जूते लेने नहीं थे, पर मुझे इस बात की हैरानी थी कि आखिर इन जूतों में ऐसा क्या ख़ास है, जिसके बारे में हर कोई बात कर रहा है।

मुझे जिज्ञासा हुई और मैने जाकर इन खूबसूरत जूतों को देखा । मेरी तरह शायद आप भी विश्वास न कर सके जब आपको ये पता चलेगा कि आखिर ये किस से बने है? इन जूतों को पुराने जूतों के तलवों से बनाया गया है।

इस साल ग्रीनसोल के दोनों फाउंडर फ़ोर्ब्स की अंडर ३० (३० के नीचे) एशिया लिस्ट में शामिल हुए हैं।

ग्रीनसोल की कहानी कुछ ऐसी है, जो वाकई सभी भी प्रेरित करेगी।

आखिर गढ़वाल से भागा १२ साल का लड़का और राजस्थान के रईस घर का लड़का कैसे आए साथ साथ?

ग्रीनसोल के दोनों फाउंडर, रमेश धामी और श्रीयांस भंडारी की परवरिश अलग अलग माहौल में हुई है। लेकिन दौड़ने के शौक की वज़ह से ही इन दोनों की मुलाक़ात हुई।

इनकी कहानी बिलकुल फिल्मी है। १२ साल की उम्र में रमेश अपने घर गढ़वाल से भाग कर मुंबई आ पहुंचे। उन्हें बचपन से ही दौड़ने का शौक था। एक दिन वो मुंबई के प्रियदर्शिनी पार्क में दौड़ने की तैयारी कर रहे थे, जहां उनकी मुलाकात श्रीयांस भंडारी से हुई।

ऐसे शुरू हुआ ग्रीनसोल का आइडिआ

रमेश ने पैसे जोड़कर महंगे जूते खरीदे थे, लेकिन वो चार महीनों में ही खराब हो गए। इसके बाद रमेश ने उन जूतों के तलवे को चप्पल की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, आश्चर्य की बात ये है कि ये काम कर गए।

रमेश को ये समझ में आने लगा कि पुराने जूतों के तलवों का नए सिरे से इस्तेमाल किया जा सकता है।

एक साथ मिलकर दोनों ने कुछ नया शुरू किया

ग्रीनसोल के को-फाउंडर श्रीयांस भंडारी तलवों से बनाये जूते बच्चों में बाँट रहे हैं

दोनों दोस्तों को जूते बनाने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन मेहनत और सीखने की इच्छा की वज़ह से दोनों ने २० साल की उम्र में अपनी जूतों की फैक्ट्री शुरू कर दी। आज इस फेक्ट्री में दिन के १०० से ज़्यादा जूते बनते है।

ग्रीनसोल के दोनों फाउंडर का मकसद है सबके पैरों तक जूते पहुंचाना। इसके लिए ये बड़ी कम्पनियों के साथ मिलकर ज़रुरतमंदो तक अपने जूते पहुंचा रहे है। उनके इस काम में इंडिया बुल्ज़, एडिडास, स्केचर्ज़, ऐक्सिस बैंक, ओ.एन.जी.सी., जे.एल.एल., जस्ट डायल, रोल्स रॉयस जैैसी कई कम्पनियां साथ दे रही हैं।

लेकिन समाज सेवा के साथ ये भी ज़रूरी है कि आप मुनाफ़े के बारे में सोचे, जिससे आपकी कम्पनी भी लम्बे समय तक टिक सके।

पुराने तलवों को सुन्दर जूतों में बदलकर ये दोनों उन्हें उचित दामों पर ग्राहकों को बेचते हैं। इनका मकसद है कि फेंके हुए सामान और शहरों के कचड़े के ढेर का फिर से उपयोग कर उसे कम किया जाए।

महाराष्ट्र के कोंडाणा गाँव में जूते दान के दौरान

ग्रीनसोल ने अब तक ८०,००० से ज़्यादा जूते ज़रूरतमंद बच्चों को दान किये है। ये सभी जूते पुराने जूतों के तलवों से बने हैं।

अगर आपको भी खुद का कुछ शुरू करना है तो इन बातों का रखिये ध्यान

ग्रीनसोल के सी.ओ.ओ. रॉकी हातिस्कार कहते हैं, “हमेशा कुछ बड़ा सोचे, और जो भी गलत हो सकता है उसके बारे में पहले से ही सोच कर रख लीजिये। मुश्किलें आना लाज़मी है , लेकिन कोई भी काम मुश्किल नहीं लगेगा अगर आप बुरे से बुरी मुसीबत के लिए तैयार हैं।”