भारत आस्थाओं और विश्वास का देश है। हमारे देश में लोगों की आस्था है कि श्री गणेश की पूजा के साथ शुरु किया गया हर काम सफल होता है। हर काम को सफल करने वाले ऐसे ही देवता श्री गणेश को समर्पित है। अष्टविनायक यात्रा के दौरान रायगढ़ जिले के पाली गांव में स्थित बल्लालेश्वर का अपना ही महत्व है। अष्टविनाक यात्रा के दौरान इस मंदिर के दर्शन तीसरे क्रम पर किए जाते है। श्री गणेश का यही एकमात्र मंदिर ऐसा है, जो उनके किसी भक्त के नाम पर समर्पित है।

मंदिर की ख़ासियत

सूंड और नाभि में हीरे जड़ित है यह मूर्ति
सूंड और नाभि में हीरे जड़ित है यह मूर्ति

प्रचलित है कि बल्लालेश्वर का प्राचीन मंदिर काष्ठ का बना था। कालांतर में इसके पुनर्निमाण के समय पाषाण का उपयोग हुआ है। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के पाली गांव में स्थित यह मंदिर सारसगढ़ और अम्बा नदी के बीच में बना हुआ है। इसमें से एक सरोवर के जल का उपयोग गणपति की पूजा और अर्चना के लिए किया जाता है। इस मंदिर के मुख्य दो भाग है। बाहरी मंडप 12 फुट ऊंचा है और अंदर का मंडप 15 फुट ऊंचा है। अंदर के मंडप में भगवान बल्लालेश्वर की प्रतिमा स्थापित है और बाहर के गर्भगृह में मूषकराज अपने दोनों पैरों में मोदक पकड़कर बल्लालेश्वर जी की आराधना में लीन दिखाई देते हैं।

श्री गणेश के दोनों और रिद्धी-सिद्धी की प्रतिमाएं भी हैं। इस मंदिर के गणपति धोती-कुर्ता पहने ब्राह्मण के साधारण परिधान में स्थापित है। पूर्व की ओर मुख वाली उनकी 3 फुट ऊंची यह मूर्ति स्वयंभू है, जिसकी सूंड बाई ओर है। इस मूर्ति की सबसे खूबसूरत बात है कि इसकी सूंड और नाभि में हीरे जड़े हुए है। इस मूर्ति को गणपति की सबसे साधारण मूर्ति माना जाता है। दरअसल, ऐसा माना जाता है कि गणपति ने अपने भक्त बल्लाल को धोती- कुर्ता पहने एकदम साधारण वस्त्रों में दर्शन दिए थे और इसलिए उनकी यहां स्थापित मूर्ति भी एकदम साधारण है।

मंदिर के उत्सव और इतिहास

उत्सव के दौरान यहां भक्तों की भीड़ होती हैं
उत्सव के दौरान यहां भक्तों की भीड़ होती हैं

बलाल्लेश्वर भगवान का मंदिर प्रातः 5:00 बजे से भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिया जाता है रात को 10:30 बजे तक यहां दर्शन किए जा सकते हैं। मंदिर के परिसर का एक और आकर्षण है यहां का विशाल घंटा है, जिसके बारे मे कह जाता है की इसे पेशवा चिमाजी अप्पा द्वारा लाया गया था। इसका निर्माण यूरोप में हुआ और एक युद्ध में फिरंगियों को पराजित करने के बाद चिमाजी ने यह घंटा भगवान के श्री चरणों मे अर्पित किया था। तबसे लेकर आज तक ये घंटा मंदिर आने वाले लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

यूं तो यहां श्री गणेश के दर्शन के लिए हमेशा ही भीड़ रहती है। हर साल भाद्रपद और माघ के महीने में यहां दो महोत्सवों का आयोजन किया जाता है। कहा जाता है कि जो भी भक्त यहां दर्शन के लिए आते है, उनकी इच्छा बल्लालेश्वर ज़रुर पूरी करते है। भाद्रपद चतुर्थी को यहां महानिद्यम और पंचमी को यहां अन्नसंतारम का आयोजन किया जाता है। अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए भक्त मंदिर की 21 बार प्रदक्षिणा करते है।

कैसे पहुंचे मंदिर तक

हवाई और रेल मार्ग दोनों से ही मंदिर तक पहुंचा जा सकता है
हवाई और रेल मार्ग दोनों से ही मंदिर तक पहुंचा जा सकता है

यह मंदिर महाराष्ट्र से मुंबई शहर से 124 किमी और पुणे से 111 किमी से लगभग समान दूरी पर रायगढ़ जिले के पाली गांव में भगवान गणेश या यह मंदिर स्थित है। हवाई, रेल और सड़क तीनों रास्तों से रायगढके पाली पहुंचा जा सकता है। नज़दीकी हवाई अड्डे में मुंबई और पुणे है तो मुंबई, अहमदनगर और पुणे नज़दीकी रेल्वे स्टेशन है। रेलमार्ग से कर्जत उतरकर बस से पाली पहुंचा जा सकता है। मुंबई से पनवेल और खोपोली होते हुए पाली 124 किलोमीटर दूर पड़ता है, जबकि लोनावाला, खोपोली होकर पुणे से पाली की दूरी सड़क मार्ग से 111 किलोमीटर पड़ेगी।

भक्तो की आस्था है कि माघ शुद्ध चतुर्थी को श्री गजानन वास्तव में मंदिर में आते है और उन्हें चढ़ाये गए नैवेद्य को ग्रहण करते है। इसीलिए इस दिन यहां हजारों लोग भगवान के दर्शन के लिए आते है। इस अलौकिक मंदिर को शत शत प्रणाम।

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