हमारे देश विविधता में एकता का देश है। यहां आपको जहां मज़ारों और गुरुद्वारों की महत्ता सुनाई देगी, तो वहीं कई प्रसिद्ध मंदिरों की गाथा भी आपका मन मोह लेगी। यहां कई ऐसे मंदिर हैं, जो अपनी अनोखी कहानियों और विशेषता के लिए लोगों के बीच बेहद प्रसिद्ध है। आज हम आपको एक ऐसे मंदिर की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसका निर्माण श्मशान के बीचों-बीच करवाया गया था। राजस्थान के जयपुर में बसे अम्बिकेश्वर महादेव का ये मंदिर, जिसका निर्माण आज से 900 साल पहले करवाया गया था, रहस्यों की खान माना जाता रहा है। आइये जानते हैं इस मंदिर के बारे में और भी विशेष बातें।

कैसे हुआ श्मशान के बीच इसका निर्माण?

इस स्थान को लाडो सती का स्थान कहा जाता है

दरअसल इस मंदिर का निर्माण तब करवाया गया था, जब यहां जंगलों के सिवाय कुछ नहीं था। अम्बिकेश्वर मंदिर कई सौ सालों पहले बनवाया गया था, जिसके पास ही एक स्थान श्मशान की तरह दिखाई देता है। इस स्थान को लाडो सती का स्थान कहा जाता है। कहा जाता है कि यहां नाथ सम्प्रदाय के एक महान साधू रहा करते थे। इतिहासकारों के मुताबिक नाथ सम्प्रदाय के साधू श्मशान में ही वास करते हैं। इस बात से यहां श्मशान होने की बात की पुष्टि की गई। कहा जाता है कि इसी मंदिर से सटकर आमेर महल की नींव रखी गई थी और इसके बाद ही इसके आस-पास आमेर राज्य को बसाया गया।

इस मंदिर के अंदर एक सुरंग दिखाई देती है, जो कहां तक जाती है किसी को नहीं मालूम। हालांकि लोग इस मंदिर की सुरंग के रास्ते कई बार अंदर जाने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन आधे रास्ते से ही डर के वापस आ चुके हैं। कहा जाता है कि ये सुरंग अब सैंकड़ों सांपों और बिच्छुओं का घर है। मंदिर में एक गर्भ गृह भी है, जिस तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। साधक इस गर्भ गृह में जाकर अपनी साधना करते हैं।

क्या है मंदिर के निर्माण की कहानी?

सावन में इस मंदिर के गर्भ गृह में पूरी तरह से पानी भर जाता है

इतिहासकारों की माने तो इस मंदिर को लेकर एक प्रसिद्द कहानी इस इलाके में प्रचलित है। कहा जाता है कि इस मंदिर के पीछे एक गाय की श्रद्धा है। काकल देव नामक एक व्यक्ति की गाय रोज़ाना चारा खाकर भी दूध नहीं देती थी। इसलिए काकल देव ने अपने नौकरों को ये पता लगाने का आदेश दिया कि कौन इस गाय का दूध दोह लेता है। जिसके बाद ये बात सामने आयी कि गाय खुद ब खुद एक गड्ढे में जाकर सारा दूध चढ़ा आती थी। इस बात के खुलते ही काकल देव ने वहां खुदवाई करवाई और वहां उन्हें करीब 15 फ़ीट का शिवलिंग दिखाई दिया। इसके बाद यहां मंदिर का निर्माण करवाया गया।

अजीब बात तो ये है कि सावन में इस मंदिर के गर्भ गृह में पूरी तरह से पानी भर जाता है। हालांकि ये कोई नहीं जानता कि ये पानी कहां से और कैसे आता है, लेकिन सावन में शिवलिंग पूरी तरह से जल समाधी ले लेता है। कहा जाता है कि यहां पहले महिलाओं के जाने पर रोक थी, इसलिए उनके लिए दर्शन की एक ख़ास व्यवस्था की गई थी। लेकिन आज इस मंदिर का रख-रखाव महिलाऐं ही करती हैं।

यदि आप जयपुर की यात्रा करने का मन बना रहे हैं, तो इस मंदिर को देखना आपके लिए एक अनोखा अनुभव हो सकता है।

मेरी आवाज़ ही पहचान है! संगीत मेरी कल्पना को पंख देता है.. किताबी कीड़ा, अडिग, जिद्दी, मां की दुलारी.. प्राणी प्रेम ऐसा कि लोग मुझे लगभग पागल समझते हैं! खाने के लिए जीनेवाली और हद दर्जे की बातूनी.. लेकिन मेरा लेखन आपको बोर नहीं करेगा..