दुनिया में एक ऐसी चीज़ है जिसके ना होने पर आप खाना नहीं बना पाएंगे।हम बात कर रहे हैं चाकू की। यह एक ऐसा हथियार है जिसका इस्तेमाल रोज़ाना दिन में कई बार होता है, लेकिन इंसानों पर नहीं, बल्कि सब्जियों पर। ऐसी खास चीज़ के महत्व को बताने के लिए आज 24 अगस्त को नाइफ डे के रूप में मनाया जाता है। नाइफ डे यानी चाकू। भारत में उत्तर प्रदेश के रामपुर में यदि आपका जाना हो, तो आपको इस जगह की विशेष चीज़ से रूबरू होने का मौका मिलेगा। रामपुर एक ऐसा गांव है जो कई सालों से इतिहास में अपनी धाक जमाए बैठा है।
बॉलीवुड फिल्मों में छाई रही रामपुरी 
जैसा कि सभी जानते हैं हिंदी फिल्मों में खलनायक रामपुरी यानी रामपुर के चाकू को बिग स्क्रीन पर फ्लॉन्ट करते थे। आलम ये था कि 60 और 70 के दशक में कई फिल्मों में खलनायक इसी रामपुरी के दम पर इतराते नज़र आए। लेकिन उत्तर प्रदेश के रामपुर में बनने वाली यह रामपुरी की शान, जिसकी धार बड़े-बड़ों को ठिकाने लगा सकती है, कुछ कम होती नज़र आ रही है।
हिंदी फिल्मों में खलनायक रामपुरी यानी रामपुर के चाकू को बिग स्क्रीन पर फ्लॉन्ट करते थे
आपको बी आर चोपड़ा की फिल्म वक्त में राजकुमार का वह डायलॉग तो याद होगा, जिसे आज भी लोग बड़ी शान से बोलते नज़र आते हैं। यह डायलॉग रामपुर के चाकू को देख कर ही बोला गया था, जो था ‘जानी यह बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं, कट जाए तो खून निकल आता है।’ ऐसे रामपुरी चाकू के बारे में आज हम आपको कुछ ख़ास बातें बताने जा रहे हैं।
रामपुर की जड़ से जुड़ा है रामपुरी का इतिहास 
पहले रामपुर शहर की पुरानी तहसील के सामने चाकू के 50 से ज्यादा बड़े व्यापारियों की दुकान थी। लगभग 2000 से ज्यादा लोग इस व्यवसाय से जुड़े थे। आलम गया था कि रामपुर बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन से उतरते ही लोग चाकू देखने की हसरत से इस बाज़ार में पहुंच जाते थे। बाजार में 3 इंच से 15 इंच तक के एक तरफा धार और दो तरफा धार, यहां तक कि एक तरफ बटन से खुलने वाले चाकू मशहूर हुआ करते थे।
18 वीं सदी में जब आग उगलने वाले हथियारों का चलन हुआ, जिसे आज बंदूक के नाम से जानते हैं, तब रामपुर के नवाब फैजुल्ला खान ने अपनी सेना के लिए छोटे हथियारों के रूप में चाकू का इस्तेमाल करना शुरू किया। वहीं  भारत के दूसरे राज्यों के नवाब राजाओं ने रामपुरी चाकू को अपनी शान समझकर अपने पास रखा। रामपुर के बेमिसाल हथियार की छाप अंग्रेजों पर पड़ी और कई अंग्रेज अफसर चाकू को देश आज़ाद होने पर अपने साथ ले गए।
मुंबई-अहमदाबाद और दिल्ली जैसे दूसरे बड़े शहरों में रामपुरी ने अपनी धाक जमाई
सन 1949 में रामपुर स्टेट का विलय हुआ, तब चाकू के व्यवसाय में सबसे ज्यादा उछाल आया और अब व्यवसाइयों को रामपुर नवाब सेना को ही चाकू देने की ज़रूरत नहीं थी, बल्कि इन व्यवसाइयों ने पूरे हिंदुस्तान में अपने बनाए हुए चाकू बेचने की शुरुआत की। मुंबई-अहमदाबाद और दिल्ली जैसे दूसरे बड़े शहरों में रामपुरी ने अपनी धाक जमाई।
जब घट गई रामपुरी की शान 
लेकिन इसी रामपुरी की शान तब घट गई, जब राज्य सरकार ने 1990 में 4 इंच से ज्यादा लंबे ब्लेड वाले चाकू को बिना लाइसेंस के बेचने तथा रखने पर पाबंदी लगा दी। कुल मिलाकर 76 लोगों ने चाकू बेचने का लाइसेंस लिया था, परंतु बाहर के खरीदार नहीं मिलने के कारण यह रामपुर का यह प्रमुख व्यवसाय समाप्ति की ओर चला गया।
आज यह हालत है कि पुरानी तहसील के सामने 2 दुकानें ही शेष बची है। इन दुकानों में चीनी चाकू, सरोते तथा ब्रांडेड कंपनियों के सब्जी काटने का चाकू दिखाई देते हैं। लेकिन फिर भी रामपुरी जिससे बॉलीवुड के बड़े-बड़े विलेन डरा करते थे, आज भी उसकी याद लोगों के ज़ेहन में उतनी ही ताजा है, जितनी पहले हुआ करती थी।

यदि आप भी रामपुरी की धार से दो दो हाथ करना चाहते हैं, तो उत्तर प्रदेश के रामपुर में जाकर इनकी परख कर सकते हैं।