दिल्ली शहर अपने अंदर ना जाने कितनी बातें छिपाए बैठा है। कई राज़, जिसके बारे में आम व्यक्ति शायद जानता भी ना हो। एक ऐसा ही राज़ है किन्नरों से जुड़ा हुआ। क्या आप जानते हैं कि दिल्ली में एकलौता ऐसा स्थान है, जहां जाकर दुनियाभर से किन्नर इबादत करते हैं? हम बात कर रहे हैं किन्नरों की खानकाह की, जो दिल्ली के महरौली इलाके में, सूफी संत बख्तियार काकी की दरगाह के पास बनी हुई है। यहां दुनिया भर से किन्नर अपने खुदा को याद करने और दुआ मांगने आते हैं। आइये जानते हैं किन्नरों के खानकाह के बारे में ख़ास बातें।

कब बनी ये खानकाह

किन्नरों की खानकाह यानी किन्नरों का यह कब्रिस्तान पंद्रहवीं शताब्दी में बनाया गया था। इस खानकाह में करीब आठ सौ साल पुरानी कब्रें बनी हुई हैं, जो किन्नरों के पूर्वजों की मानी जाती है। सद्दो बाई जिन्हे किन्नरों के गुरु का दर्जा मिला है, इनकी कब्र को किसी संत की तरह यहां पूजा जाता है। कहा जाता है कि सूफी संत क़ुतुब साहिब ने ये जगह सद्दो बाई और किन्नरों के नाम कर दी थी, जिसके बाद सद्दो बाई ने इस जगह को बनवाया। आज करीब 800 साल बाद स्थानीय लोग इसे हिंजड़ों की मस्जिद के नाम से जानते हैं। जहां हर साल देश के कोने-कोने से किन्नर यहां मन्नत मांगने आते है।

सूफी संत क़ुतुब साहिब ने ये जगह सद्दो बाई और किन्नरों के नाम कर दी थी

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किन्नरों के लिए ख़ास जगह

यह जगह किन्नरों के लिए बेहद ख़ास मानी जाती है। कहा जाता है कि पूरे देश में ऐसी जगह और कोई नहीं। लेकिन किन्नरों की ऐसी ही एक मस्जिद पाकिस्तान में मौजूद है। इस खानकाह में मुहर्रम के मौके पर हलीम बनाकर बांटा जाता है। वहीं गुरूवार के दिन इस स्थान में अगरबत्ती जलाई जाती है।

12 दुकानों का वेतन ना के बराबर

यहां का रख-रखाव करने वाले व्यक्ति की माने तो इस परिसर में मौजूद 12 दुकानें आज भी बेहद कम मासिक वेतन पर चल रही हैं। इस कब्र का मालिकान हक़ किन्नर पन्ना हाजिरी के पास है, जो साल में एक बार लोगों को दान देने और दुकानों के मालिकों से वेतन लेने आती हैं। वहीं कुछ लोगों का मानना है आज के ज़माने में भी लोग इन दुकानों का वेतन 100 रूपए ही देते हैं।

आज करीब 800 साल बाद स्थानीय लोग इसे हिंजड़ों की मस्जिद के नाम से जानते हैं

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50 कब्रों में दफ़्न है किन्नरों की कहानी

दरअसल सद्दो बाई की कब्र के साथ-साथ इस स्थान पर 50 अन्य किन्नरों की कब्रें भी हैं, जहां हर साल किन्नर दुआ मांगने और दान देने आते हैं। हालांकि अब यहां किसी भी किन्नर को दफनाया नहीं जाता है, लेकिन ये जगह बेहद पाक मानी जाती है।

यदि आप भी दिल्ली के महरौली इलाके में जाएं, तो यहां की तंग गलियों में छुपे किन्नरों के राज़ से रूबरू हो सकते हैं।

मेरी आवाज़ ही पहचान है! संगीत मेरी कल्पना को पंख देता है.. किताबी कीड़ा, अडिग, जिद्दी, मां की दुलारी.. प्राणी प्रेम ऐसा कि लोग मुझे लगभग पागल समझते हैं! खाने के लिए जीनेवाली और हद दर्जे की बातूनी.. लेकिन मेरा लेखन आपको बोर नहीं करेगा..