गणपति महोत्सव के शुभ मौके पर सभी भक्त गणपति के दर्शन करने में विश्वास रखते है। इस महोत्सव के दौरान अष्टविनायक की यात्रा का बहुत महत्व है। गणपति को समर्पित अष्टविनायक मंदिर स्वयंभू मंदिर है और इन मंदिर में सबसे पहले पुणे से 80 किलोमीटर दूर करहा नदी के किनारे स्थिट मोरगांव का मयूरेश्वर या मोरेश्वर मंदिर है। इस मंदिर में गणपति के चारभुजाधारी स्वरुप के दर्शन करने को मिलेंगे, जिनके तीन नेत्र है। गांव की प्राकृतिक सुंदरता के बीच बना यह मंदिर कई वर्षो पुराना है। इस मंदिर की गिनती भारत के प्राचीनतम मंदिरों में भी होती हैं। इस मंदिर के चार कोनों में मीनारे बनी हुई हैं औऱ दीवारे लंबे पत्थरों की है।

मंदिर की ख़ासियत

इस गणपति को त्रेता युग का अवतार माना जाता है

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इस मंदिर के गणपति बैठी मुद्रा में है और उनकी सूंड बाय हाथ की ओर हैं। गर्भ में स्थित इस प्रतिमा को सिंदूर और हार से सजाया गया है। गणपति की इस मूर्ति को देख कई श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। यहां गणपति के मुख मुर्ति की आरती सुबह 7 बजे, दोपहर 12 बजे और रात 8 बजे होती हैं। मयूरेश्वर गणपति को गणपति के त्रेता युग का अवतार माना जाता है। एक किंवंदती के मुताबिक ब्रह्मा ने सभी युगों में भगवान गणपति के अवतार की भविष्यवाणी की थी, मयूरेश्वर त्रेतायग में उनका अवतार थे। मुद्गल पुराण के 22 वे अध्याय में मोरगांव की महानता का वर्णन किया गया है। गणेश पुराण के अनुसार मोरगांव का मोरेश्वर यानी मयूरेश्र्वर मंदिर भगवान गणेश की 3 मुख्य और सबसे महत्वपूर्ण जगहों में से एक है। दूसरी दो जगहों में स्वर्ग में स्थापित कैलाश और पाताल में बना आदि-शेष शामिल है। किवंदती है कि इस मंदिर का कोई प्रारंभ और अंतिम स्थान नही है। जबकि कुछ मान्यताओं के अनुसार प्रलय के समय भगवान गणेश यहाँ आए थे।

इस मंदिर के प्रवेशद्वार पर शिवजी के वाहन नंदी बैल के साथ-साथ मूषक की मूर्ति है। कहा जाता है कि गणपति का यही एक मात्र मंदिर है,जहां शिव के वाहन नंंदी की मूर्ति विराजमान है। प्रवेशद्वार पर मौजूद मूषक और नंदी दोनों को ही मंदिर का रक्षक कहा जाता है। नंदी की मूर्ति का मुख भगवान गणेश की मूर्ति की ओर हैं। प्राचीन कथाओं के अनुसार भगवान शिव और नंदी इस मंदिर क्षेत्र में विश्राम के लिए रुके थे। नंदी को ये स्थान इतना भाया कि उन्होंने यहां से जाने से मना कर दिया और यहीं ठहर गए, तबसे उनकी प्रतिमा यहां स्थापित है।

मंदिर के नाम के पीछे भी दिलचस्प कहानी

इस मंदिर के चार द्वार है जिसे चारों युग सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग का प्रतीक माना जाता है

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इस मंदिर का नाम मोरेश्वर या फिर मयूरेश्वर होने के पीछे की कहानी भी काफी रोचक है। मान्यता है कि भगवान गणेश ने इसी स्थान पर सिंधुरासुर नाम के राक्षस का वध किया था, वह राक्षस काफी भयानक था, उसने सूर्य की उपासना कर अमर रहने का वर प्राप्त कर लिया था। उसके आतंक से ऋषि मुनी से लेकर देवता सभी सहमे हुए थे और उसने देवलोक पर भी विजय प्राप्त कर ली थी। उससे परेशान होकर सभी देवों ने गणपति की पूजा की एक दिन गणपति ने माता पार्वती से कहा माता मैं दैत्यराजज सिंधु का वध करूंगा। तब भोलेनाथ ने उन्हें आशिर्वाद दिया कि उनका कार्य निर्विघ्न पूरा होगा। तब मोर पर बैठकर गणपति ने दैत्य सिंधु की नाभि पर वार किया और उसका अंत कर देवताओं को विजय दिलवाई। भगवान गणेश ने मयूर यानी मोर पर सवार होकर उसका वध किया था इसलिए इस मंदिर का नाम भी मोरेश्वर पडा।

कई महोत्सवों का भी होता है यहां आयोजन

विजयादश्मी पर भी होता है बड़ा महोत्सव

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गणेश चतुर्थी के समय यहां का उत्सव और नज़ारा देखने लायक होता है। भाद्रपद्र शुक्ल चतुर्थी यानी गणेश चतुर्थी पर शुरु हुआ उत्सव यहां अश्विन शुक्ल तक यानी लगभग एक महीने चलता है। इस उत्सव के अलावा माघ शुक्ल चतुर्थी यानी गणेश जयंती भी यहां का मुख्य उत्सव है और इस उत्सव में लाखों श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं। यहां का दशहरा भी काफी प्रसिद्ध है।

कैसे पहुंचे मंदिर

मंदिर के आस-पास भी देखने वाले कई स्थल है

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मंदिर जाने के लिए बस मार्ग और रेल मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है। यहां पहुंचने के लिए सबसे सुविधाजनक रास्ता पुणे से जाता है। पुणे से मोरगांव जाने के लिए बस, रेल तथा स्थानीय बसों की सुविधा उपलब्ध है। पुणे-शोलापुर राजमार्ग से मोरगांव की पुणे से दूरी लगभग 80 किलोमीटर है। इसके अलावा अन्य मार्ग पुणे से जेजूरी और जेजूरी से मोरगांव का है। इस मार्ग से पुणे और मोरगांव की दूरी लगभग 64 किलोमीटर होती है। अगर आप रेल के माध्यम से जा रहे हैं तो पुणे-डौंड रेलमार्ग केडगांव होकर बस द्वारा मोरगांव पहुंचा जा सकता है। इसी प्रकार दक्षिण रेलवे के नीरा रेल्व स्टेशन पहुंचकर बस द्वारा मोरगांव पहुंचा जा सकता है।

मंदिर के आस-पास भी देखने लायक कई स्थल है। मंदिर के पास करहा नही के बारे में माना जाता है कि भगवान ब्रह्मदेव द्वारा सात तीर्थों के जल से यह पवित्र नदी प्रकट हुई थी। इस नदी में 7 स्नान तीर्थ है, जो पापों का नाश करने वाले माने जाते हैं।

जदभरत यह स्थान भी श्रद्धालुओं में काफी प्रसिद्ध है। यह करहा नदी के उत्तर में स्थित है। यहां की शिला पर पांच शिवलिंग हैं। इसी के साथ जनग्रभैरव के दर्शन भी आप यहां जाने से पहले कर सकते हैं। यह मोरगांव से पूर्व की ओर डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित है। मयूरेश्वर गणेश के दर्शन के पूर्व श्रद्धालु नग्रभैरव के दर्शन करते हैं और गुड़ और नारियल का प्रसाद चढ़ाते हैं।

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अष्टविनायक

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।