किसी भी विदेश यात्रा में जाने के लिए आपको सबसे पहले पासपोर्ट की जरूरत पड़ती है। यह एक ऐसा पहचान पत्र है, जिससे आप किसी भी देश में सुरक्षित माने जाते हैं। अपने देश की सीमा को पार करने के बाद दूसरे देश में जाने की अनुमति आपको पासपोर्ट ही देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है? दरअसल प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इसे शाही अनुमति पत्र के तौर पर देखा जाता था, जिसने बाद इसे पासपोर्ट का रूप दे दिया गया।

कैसा था पासपोर्ट का इतिहास?

ऐतिहासिक समय यानी राजाओं के ज़माने में भी पासपोर्ट हुआ करता था, लेकिन इसे राजपत्र का नाम दिया गया था। यह राजा के द्वारा दी गई किसी व्यक्ति को देश में आने की अनुमति होती थी। लेकिन समय के साथ-साथ यह पासपोर्ट में तब्दील होता गया। दरअसल पासपोर्ट यह शब्द फ्रेंच शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ होता था पोर्ट से गुज़रने के लिए आधिकारिक अनुमति।यह एक प्रकार का दस्तावेज हुआ करता था, जिसके अनुसार आप किसी भी राज्य की सीमा को बिना रुकावट पार पार कर सकते थे।

ब्रिटेन में अलग नियम

ब्रिटेन में पासपोर्ट को लेकर अलग तरह के नियम है। दरअसल पासपोर्ट यहां पर सिर्फ आम जनता के लिए जारी किए जाते थे, जिसके लिए राजा या रानी की अनुमति की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। यही वजह है कि आज तक महारानी एलिजाबेथ किसी पासपोर्ट का इस्तेमाल नहीं करती। वहीं सबसे पुराना पासपोर्ट ब्रिटेन में ही मौजूद है, जिसे 1641 में जारी किया गया था। हालांकि पासपोर्ट की इस सुविधा को फ्रांस सरकार ने 1861 में ख़ारिज कर दिया था, लेकिन इसके बाद प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इसे फिर से जारी कर दिया गया।
दरअसल प्रथम विश्व युद्ध के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा खड़ा हो गया था, जिसकी वजह से इसे फिर से कुछ समय के लिए जारी किया जाने लगा।

भारत में पासपोर्ट

भारत में तीन तरह के पासपोर्ट का चलन है। 1914 में सबसे पहले पासपोर्ट का इस्तेमाल किया गया था, जिसे डिफरेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत इस्तेमाल किया जाता था। कुछ सालों के बाद 1920 में भारत में पासपोर्ट एक्ट लागू किया गया, जिसमें पासपोर्ट का काम विदेश मंत्रालय को सौंपा गया। भारत में तीन प्रकार के पासपोर्ट जारी किए जाते हैं, जिसमें रेगुलर, ऑफिशियल और डिप्लोमेटिक पासपोर्ट होते हैं। भारत में नीले रंग के पासपोर्ट आम नागरिकों के लिए होते हैं, वहीं सफेद रंग के पासपोर्ट गवर्नमेंट ऑफिशल के लिए जारी किए जाते हैं। तीसरा रंग यानी मैरून रंग इंडियन डिप्लोमेट और सीनियर गवर्नमेंट ऑफिशल्स के लिए जारी होते हैं। जिसके अंतर्गत धारकों के लिए वीज़ा की ज़रूरत नहीं पड़ती और उन्हें ज्यादा सुविधाएं मिलती है।

इस तरह पासपोर्ट आज से ही नहीं, बल्कि प्राचीन समय से जारी किये जाते थे।

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