अष्टविनायक यात्रा का आखिरी पड़ाव है पुणे से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित राजणगांव का महागणपति मंदिर। जहां रेल, सड़क दोनों ही मार्ग से जाया जा सकता है। इस मंदिर को 9-10वीं सदी के बीच का माना जाता है। पूर्व दिशा की ओर मंदिर का बहुत विशाल और सुन्दर प्रवेशद्वार है। इस भव्य प्रवेशद्वार पर दो द्वारपाल जय और विजय है। यहां गणपति की मूर्ति को ‘महोत्टक’ नाम से भी जाना जाता है। भगवान श्री गणेश की इस मूर्ति की सूंड बाई तरफ है और उसकी 10 सूंड और 20 हाथ है। इस मंदिर में विराजित गणेश हथियारों से सुसज्जित है। महागणपति जी की इस मूर्ति को 8, 10 या 12 हथियारों के साथ सजाया जाता है। इस मूर्ति के साथ ही रिद्धी और सिद्धी की मूर्ति भी विराजमान है। यह मंदिर 9वीं और 10वीं सदियों की वास्तुकला की याद ताज़ा कर देता है। इसकी मंदिर की बनावट ऐसी है कि सूर्य की किरणें सीधे मूर्ति पर पड़ती हैं और मूर्ति का श्रृंगार रोज सोने के आभूषणों के साथ किया जाता है। मराठा पेशवा माधवराव इस मंदिर की अक्सर यात्रा करते थे। उन्होंने सन 1790 में मूर्ति के आस-पास पत्थर के गर्भगृह का निर्माण करवाया था।

मंदिर की मूल मूर्ति तहखाने में छुपी होने की मान्यता प्रचलित है

विदेशी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए मूर्ति को छिपाया गया था
विदेशी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए मूर्ति को छिपाया गया था

मंदिर की मूर्ति तहखाने में छिपी होने के साथ-साथ इससे जुड़ी एक और दिलचस्प कथा है। दरअसल, इस मंदिर का निर्माण खुद शिव जी ने कराया है। शिव ने त्रिपुरासुर के साथ युद्ध करने से पूर्व गणेश जी की पूजा की थी तत्पश्चात इस मंदिर का निर्माण करवाया। कथानुसार त्रिपुरासुर नामक एक दानव ने शिव के वरदान से तीन शक्तिशाली क़िलों का निर्माण किया, जिससे वह स्वर्ग में और पृथ्वी पर सभी प्राणियों को दु:ख देता था। भक्तों की प्रार्थना सुनने के बाद शिवजी ने इस दानव का नाश करना चाहा, किंतु वे असफल रहे। इस पर नारदमुनी की सलाह मान कर शिवजी ने गणेश को नमन किया और तीनों क़िलों को मध्यम से छेदते हुए एक एकल तीर से भेद दिया। शिव का मंदिर पास ही भीमाशंकरम में स्थित है। त्रिपुरासुर के वध के बाद बनाए गए इस मंदिर को त्रिपुरारी महागणपति या फिर ‘त्रिपुरारिवरदे महागणपति’ के तौर पर भी जाना जाता है। इस मंदिर की दीवारों पर इस मंदिर की कथा को चित्रों के माध्यम से दिखाया गया है।

मंदिर के उत्सव- ज्येष्ठ, माघ और भाद्रपद में प्रतिपदा से लेकर चतुर्थी तक इस मंदिर में उत्सव जैसा माहौल होता है। लोगों की श्रद्धा है कि महागणपति की चार बहने इस मंदिर की चारों दिशाओं में रहती हैं और भाद्र के उत्सव के लिए गणेश की उत्सव मूर्ति को पालकी में रखकर श्रद्धालु उनकी बहन को लाने के लिए चारों दिशाओं में पदयात्रा करते हैं और 6 महीने यहां रखने के बाद माघ के महीने में उनकी विदाई की जाती हैं। यह मंदिर सुबह 5 से रात 10 बजे तक दर्शनों के लिए खुला रहता है। सुबह 5 की आरती के बाद दोपहर 11.30 से 12.30 महाआरती की जाती हैं। इस स्थान को पहले मणिपुर के नाम से जाना जाता था पर आज इसे लोग राजणगांव कहते हैं।

श्री गणेश भगवान के यह सभी अष्ट रूप उनकी महिमा और उदारता के उदाहरण हैं। वेदों, पुराणों में श्री गणेश की महिमा का विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है। ऋग्वेद में कहा गया है ‘न ऋते त्वम क्रियते किं चनारे’ अर्थात- “हे गणपति महाराज, तुम्हारे बिना कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ नहीं किया जाता है। तुम्हें वैदिक देवता की उपाधि प्राप्त है”। गणेश आदिदेव हैं, उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व प्रभावी गुणों से युक्त है। गणेशजी के सभी रूप एवं प्रतीक यह दर्शाते हैं कि हम अपनी बुद्धि को जाग्रत रखें। अच्छी बातों को ग्रहण करें, पापों का शमन करें तथा तमोगुण को दूर कर सत्वगुणों का विस्तार करें।

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