मध्यप्रदेश की बुरहानपुर जिले में है असीरगढ़ किला, जो अपने अंदर एक गहरे रहस्य को छुपाए हुए है। असीरगढ़ का ये किला महाभारत के काल से है और इसका सीधा संबंध महाभारत से है। यह जगह खांडव जिले के पास है, जो महाभारत के काल में खांडव वन के नाम से जाना जाता था। हालांकि ये पूरा क्षेत्र आपको मुगलकाल की याद दिलाता है, लेकिन इसके बाद भी ये किला और इसमें मौजूद शिव मंदिर महाभारत से आज भी जुड़े हुए हैं। यह किला दिखने में जितना खूबसूरत है, यहां पहुंचना उससे कई ज़्यादा मुश्किल है। इस किले तक पहुंचने का रास्ता बेहद दुर्गम है, लेकिन इसके बाद भी पर्यटक यहां आना पसंद करते है। इसका कारण है इस किले से जुड़ा ऐसा रहस्य, जिसके तार महाभारत से जुड़े हुए हैं। आइये जानते हैं इस किले के रहस्य के बारे में कुछ खास बातें।

क्या अश्वत्थामा द्वारा की जाती है पूजा?

रोज़ाना इस मंदिर के शिवलिंग में गुलाब का एक फूल और रोली पाई जाती है

दरअसल, इस किले को महाभारत काल से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि इसकी एक सुरंग खांडव वन के क्षेत्र से भी जुड़ी हुई है। लेकिन इस किले के शिव मंदिर में रोज़ाना एक ऐसी घटना होती है, जिसे समझ पाना बेहद मुश्किल है। इतने दुर्गम क्षेत्र में बने इस किले तक पहुंचना बेहद मुश्किल है, साथ ही यहां पर मूलभूत सुख-सुविधाएं, जैसे बिजली और पानी तक नहीं है। इसके बाद भी इस मंदिर में ब्रह्म मुहूर्त में रोज़ कोई पूजा करता है। रोज़ाना इस मंदिर के शिवलिंग में गुलाब का एक फूल और रोली पाई जाती है। आपको जान कर हैरानी होगी कि इस किले में प्रवेश के लिए मात्र एक ही दरवाज़ा है, जो शाम सात बजे के बाद बंद हो जाता है। ऐसी स्थिति में कौन रोज़ इस शिव मंदिर में पूजन करता है, यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है। स्थानीय लोगों में ये अखंड विश्वास है कि ये पूजा रोज़ाना महाभारत के योद्धा अश्वत्थामा करते हैं। खांडव वन के रास्ते वे रोज़ाना इस मंदिर में आते हैं। कुछ लोगों को अश्वत्थामा के यहां होने का भी एहसास हो चुका है। ऐसी कई कहानियां इस क्षेत्र में प्रचलित है।

कौन है अश्वत्थामा?

श्रीकृष्ण ने उन्हें श्राप दिया था कि वे अपनी सारी शक्तियां खो देंगे और इस पृथ्वी के अंत तक ज़िंदा रहेंगे

अश्वत्थामा महाभारत काल के एक ऐसे योद्धा थे, जो महाभारत के युद्ध में कौरवों के साथ थे। पांडवों और कौरवों के गुरु द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा ने पांडवों से बदला लेने के लिए उनके सोते हुए बच्चों को मार डाला था। जिसके बाद श्रीकृष्ण ने उन्हें श्राप दिया था कि वे अपनी सारी शक्तियां खो देंगे और इस पृथ्वी के अंत तक ज़िंदा रहेंगे। उन्हें मांगने पर भी मौत नहीं आएगी और वे समय के अंत तक भटकते रहेंगे। असीरगढ़ के किले में आज भी अश्वत्थामा के रोज़ आने की कहानियां प्रचलित है। हालांकि किसी ने उन्हें आज तक नहीं देखा, लेकिन लोगों के मन में उनके होने का दृढ विश्वास कायम है।

कैसे पहुंचे असीरगढ़?

बुरहानपुर से इसकी दूरी करीब 20 किलोमीटर की है

करीब 60 एकड़ में फैला ये किला आपको दूर से ही दिखाई दे जाता है। ये बुरहानपुर हाइवे से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सबसे पहले आपको बुरहानपुर सिटी तक पहुंचना होगा। बुरहानपुर से इसकी दूरी करीब 20 किलोमीटर की है। यहां पहुंचने के लिए आपको रोड ट्रिप लेनी होगी। यहां तक आप बस या ऑटो से भी सफर तय कर सकते हैं।

यदि आप इस किले की दुगुनी खूबसूरती देखना चाहते हैं, तो आप मानसून में भी ये किला देख सकते हैं। ये अपने आप में एक बेस्ट मानसून डेस्टिनशन भी है।

मेरी आवाज़ ही पहचान है! संगीत मेरी कल्पना को पंख देता है.. किताबी कीड़ा, अडिग, जिद्दी, मां की दुलारी.. प्राणी प्रेम ऐसा कि लोग मुझे लगभग पागल समझते हैं! खाने के लिए जीनेवाली और हद दर्जे की बातूनी.. लेकिन मेरा लेखन आपको बोर नहीं करेगा..