भारत को उत्सवों और समारोह की भूमि के रूप में जाना जाता है। भारत के मंदिर हमारे समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का एक अभिन्न अंग हैं। इन मंदिरों में विशेष और महत्वपूर्ण तरीके से देवों की पूजा की जाती है। हम आपके समक्ष लेकर आए हैं भारत के 5 मंदिर उत्सव जो अनुभव करने लायक हैं।

अट्टूवेला महोत्सवम, केरल

इन मंदिरों की चमकदार झलक चांदनी रात में जादुई लगती हैं

मार्च-अप्रैल के महीनों में मनाया जाने वाला यह दो दिवसीय त्योहार केरल के कोट्टायम जिले में ‘एलमकवु(Elamkavu) भगवती मंदिर’ में आयोजित किया जाता है। यह त्यौहार कोडुन्गल्लुर(Kodungallur) की देवी के स्वागत में मनाया जाता है, जो हर साल अपनी बहन से मिलने आती है। इस मंदिर में देवी भगवती की मौजूदगी होने की बात कही गई है। इस उत्सव का मुख्य आकर्षण है पानी के पार बहती हुई मंदिर की चमकदार झलक, जिसके चारों ओर आपको शानदार ढंग से सजाए गए छोटे डोंगे नज़र आएंगे।  इसी के साथ मंदिर में आघात-वाद्ययंत्र से बज रहे शानदार संगीत की ध्वनि आपके कानों पर पड़ेगी। दिल को छू लेने वाला यह उत्सव मंदिर से 2 किमी की दूरी पर अट्टूवेला कडावू से शुरू होता है।

पुरी में रथयात्रा

रथयात्रा भारत के सबसे भव्य मंदिर त्योहारों में से एक है

पुरी, ओडिशा में हर साल आयोजित होने वाले ‘भगवान जगन्नाथ के रथ’ का त्योहार शायद सबसे प्रसिद्ध और सबसे भव्य है। यह कुंभ मेले के बाद दूसरा ऐसा उत्सव है, जो इतने बड़े पैमाने पर किया जाता है। रथयात्रा के इस त्यौहार का महत्व है जून-जुलाई के महीने से शुरू हो रही वर्षा-ऋतु की घोषणा करने में है। इस 10-दिवसीय रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ को पास के गुंडिचा माता के मंदिर की वार्षिक यात्रा पर ले जाया जाता है। अनगिनत तीर्थयात्री भगवान जगन्नाथ के रथ को रस्सियों से खींचने में मदद करने की इच्छा के साथ त्योहार के दौरान पुरी आते हैं। यात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियों को बाहर लाया जाता है और ‘स्नानमंडप’ नामक बैठक पर उन मूर्तियों के साथ कुछ रस्में पूरी की जाती है। यह स्नान लकड़ी से बने देवताओं की मूर्तियों पर से पेंट को नष्ट कर देता है और अगले 15 दिनों के दौरान मूर्तियों को फिर से रंगा जाता है और भक्तों के समक्ष दर्शन के लिए ‘रत्नावेदी’ नामक मंच पर लाया जाता है। इस समारोह को नेत्रोत्सव कहा जाता है। रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की बड़ी मूर्तियों को हर साल अलग अलग रथ पर मंदिर से ले जाया जाता है। जगन्नाथ का रथ, ‘नंदीघोष’, 35 फीट से 45 फीट ऊंचा बनाया जाता है जो 16 पहिए के साथ 7 फीट चौड़ा और पीले रंग का होता है। बलराम का रथ ‘तालध्वज’ नीले रंग का होता है और उसके 14 पहिए होते हैं। सुभद्रा का रथ 12 पहियों के साथ सबसे छोटा है और इसे ‘देवदलन’ कहा जाता है। उन्हें दो सप्ताह के लिए गुंडिचा बारी के एकांत स्थान में निवास करना पड़ता हैं, जहां उनका उपचार किया जाता है, उन्हें विशेष आयुर्वेदिक दवा और सरपाना नामक एक विशेष ‘तरल आहार’ दिया जाता है। एक सप्ताह के आराम के बाद उन्हें पुरी के मंदिर में वापस ले जाया जाता है। यह वापसी यात्रा या बाहुदा यात्रा  ‘आषाढ़ शुक्ल दशमी’ के दिन शुरू होती है। रथयात्रा के दिन मंदिर के कर्मचारी और मंडली के सभी सदस्य भारी मात्रा में खाद्य पदार्थ पकाते हैं, और हर कोई इस महाप्रसादम का पेट भरके आनंद लेता है। इस रथ यात्रा को “राज्य उत्सव” घोषित किया गया है।

करगा महोत्सव, कर्नाटक

चमेली के फूल, करगा महोत्सव के दौरान पोशाक में शामिल करना आवश्यक है

यह कर्नाटक के सबसे पुराने त्योहारों में से एक है और हर साल बैंगलोर में नौ दिनों के लिए आयोजित किया जाता है। यह त्योहार महान देवी द्रौपदी के सम्मान में मनाया जाता है। त्यौहार के अंतिम दिन, तिगाला समुदाय में से चुने हुए एक आदमी को द्रौपदी का प्रतिनिधित्व करने के लिए, एक स्त्री के पोशाक में तैयार किया जाता है और उसे बिना छुए अपने सिर पर पिरामिड आकार की पुष्प से बनी एक वस्तु को रखना होता है। पुरुष अपनी  नंगी छाती पर तलवारों से प्रहार करते है और लाइव चारकोल पर नंगे पैर नृत्य करते है। तिगाला समुदाय का मानना है कि महाभारत के अंत में पांडवों को नरक की झलक दिखाई गई थी क्योंकि एक आखिरी दानव त्रिपुरासुर जीवित था और तब पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने शक्ति का रूप धारण कर, योद्धाओं की एक सेना बनाई और उस आखिरी राक्षस का वध किया। उन योद्धाओं ने शक्ति / द्रौपदी को अपने साथ वापस आने के लिए आग्रह किया था। चूंकि वह ऐसा नहीं कर सकती थी, इसलिए उन्होंने हर साल हिंदू कैलेंडर के पहले महीने की पहली पूर्णिमा के दौरान उनके साथ रहने का वादा किया। तिगाला को सैनिकों के इस समुदाय का उत्तराधिकारी माना जाता है। यह रंगीन प्रदर्शन निश्चित रूप से एक अनुभव करने लायक है।

कैला देवी मेला, राजस्थान

यह प्रतिष्ठित कैला देवी मेला राजस्थान के करौली जिले में “कैला देवी मंदिर” में मार्च-अप्रैल  के दौरान मनाया जाता है।

प्रसिद्ध कैला देवी मेला राजस्थान के करौली जिले में “कैला देवी मंदिर” में मार्च-अप्रैल के महीनों के दौरान मनाया जाता है। मेले के दौरान देवी कैला, जो कि मंदिर के पीठासीन देवी हैं, की प्रार्थना की जाती है। यह मेला अन्य राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, दिल्ली और हरियाणा के कई तीर्थ यात्रियों को आकर्षित करता है जो देवी को नकद, नारियल, काजल (कोहल), टिक्की (सिंदूर), चूड़ियां और मिठाइयां भेंट करते हैं। एक असामान्य अनुष्ठान – ‘कनक-दण्डोति’ को भक्तों द्वारा पूरा किया जाता है, जिसके तहत भक्तजन मंदिर तक 15 से 20 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं और उसी दिशा में उस स्थान पर अपने हाथों से रेखा खींच कर चिह्न बनाते हैं, फिर उठकर उसी खींची गई रेखा से आगे बढ़कर यह प्रक्रिया दोहराते है। हालांकि कुछ भक्त बीच-बीच थोड़ा आराम कर में भोजन करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी भक्त होते हैं जो मंदिर पहुंचने तक अपनी भूख और थकावट को सहन कर लेते हैं। यह उत्सव, इस क्षेत्र के लोगों के जीवन और वीरता की एक शानदार झलक है।

अंबुबाची मेला, असम

अंबुबाची मेले के चारों ओर रहस्य और साजिशों का आभास होता है।

गुवाहाटी में अंबुबाची मेला हर साल वर्षा-ऋतु के दौरान मनाया जाता है, जो जून के महीने के मध्य में पड़ता है। गुवाहाटी, असम का ‘कामाख्या देवी मंदिर’ देवी कामाख्या को समर्पित मंदिर है और धरती माता का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसा माना जाता है कि मंदिर की देवी, देवी कामाख्या, मां शक्ति, इस समय के दौरान अपने मासिक धर्म के वार्षिक चक्र से गुज़रती हैं। इस त्योहार की अवधि के दौरान कामाख्या मंदिर के दरवाज़े तीन दिनों के लिए बंद रहते हैं क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि धरती माता तीन दिनों के लिए अशुद्ध हो जाती है। इसीलिए इन्ही तीन दिनों के दौरान खेती के किसी भी तरह के काम के लिए मनाही होती है। मेले के दौरान दैनिक पूजा और अन्य धार्मिक प्रदर्शन को भी रोक दिया जाता है। तीन दिनों के पूरा होने के बाद जब देवी कामाख्या को स्नान करवाकर और अन्य रस्में निभाई जाती है तभी कामाख्या मंदिर के दरवाज़े फिर से खोलें जाते हैं।

कई दिनों में फैले यह त्यौहार विस्तृत और रंगीन रस्मों-रिवाजों से भरे हुए होते हैं। इस दौरान होते विशाल मेले, संगीत और नृत्य के कार्यक्रम काफी रोमांचक होते हैं। वहां उपस्थित लोग विशेष तौर पर देवताओं की पूजा करते हैं और इश विशेष पूजा और प्रार्थना सत्र में भाग लेने के लिए पहले से ही बुकिंग करवाते है। इन प्रसिद्द मंदिर त्योहारों का हिस्सा बनने के लिए बिना संकोच किये इन मंदिरों के अधिकारियों से संपर्क करें।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।