सावन का पवित्र महीना चल रहा है और सावन के इस महीने में आज का दिन सावन शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। शिवरात्रि के दिन शिव जी की आराधना की जाती है। इस दिन भगवान शिव का अलग-अलग वस्तुओं से अभिषेक किया जाता है और उन्हें प्रसन्न कर मनोकामना मांगी जाती है। जैसा कि सभी जानते हैं शिवजी की महिमा को जानने के लिए शिवपुराण प्रचलित है। इस पुराण में एक ऐसे अध्याय को खास तौर पर वर्णित किया गया है, जिसे समुद्रमंथन कहा जाता है। आइये जानते हैं कैसे ये समुद्रमंथन शिव जी की कृपा के बिना पूरा नहीं होता।

क्यों है समुद्रमंथन का भगवान शिव से सम्बन्ध?

इसी पिंजरत गांव में 1988 में द्वारका नगरी के अवशेष मिले थे

पौराणिक कथाओं की माने तो समुद्रमंथन दैत्यों और देवताओं के बीच हुआ था। इस मंथन में शिव जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। समुद्र मंथन के दौरान जब कालकूट विष निकला, तब शिव जी ने दैत्य और दानव दोनों को बचाने के लिए इसका पान किया था। इस विष को पीने की वजह से शिवजी का कंठ नीला पड़ गया था। यही वजह है कि उन्हें नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि भारत में वह कौन सी जगह है, जहां समुद्रमंथन किया गया था। यदि नहीं तो आज हम आपको इसी जगह के बारे में कुछ खास बातें बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं कहां और कैसे हुआ समुद्रमंथन।

कहां हुआ था समुद्रमंथन?

दरअसल समुद्रमंथन देवता और दानवों के बीच मंदराचल पर्वत के चारों ओर वासुकी नाग को लपेटकर किया गया था। यह पर्वत अब गुजरात के दक्षिणी समुद्र में मिल गया है। भारत में हुए एक वैज्ञानिक परीक्षण के अनुसार इसकी पुष्टि कर दी गई है। दक्षिण गुजरात में पिंजरत गांव समुद्र के किनारे बसा हुआ है, वहीं सुंदरतल में इसके होने की पुष्टि वैज्ञानिकों ने कर दी है। एक शोध में ये बात सामने आई है कि ये पर्वत काफी बड़ा है और इसके बीच में बीच नाग की आकृति बनी हुई हुई है।

क्या कहती है रिसर्च?

इस पर्वत पर घिसाव के निशान साफ नजर आ रहे थे, जिसके बाद इसका अध्ययन शुरू किया गया

मंदराचल पर्वत का इस्तेमाल समुद्र मंथन के दौरान किया गया था। वैज्ञानिकों द्वारा की गई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि समुद्र तल में पाए जाने वाले पर्वत की बनावट की तुलना में इस पर्वत की बनावट अलग थी, साथ ही इसमें ग्रेनाइट के मात्रा का ज्यादा होना इस बात का प्रमाण था कि यही मंदराचल पर्वत है। इसी पिंजरत गांव में 1988 में द्वारका नगरी के अवशेष मिले थे, तब से ही इस समुद्र के तल में शोध कार्य चल रहा था। इसी रिसर्च के दौरान समुद्र के तल में 800 मीटर की गहराई में यह पर्वत मिला। इस पर्वत पर घिसाव के निशान साफ नजर आ रहे थे, जिसके बाद इसका अध्ययन शुरू किया गया। हालांकि ऐसे निशान जल तरंगों से भी बन सकते थे, लेकिन इस पर किए गए विशेष कार्बन टेस्ट से यह बात सामने आई कि यही पर्वत मंदार पर्वत है, जिसका इस्तेमाल समुद्र मंथन के लिए देव और दैत्यों द्वारा किया गया था। यह पर्वत पिंजरत गांव से दक्षिण दिशा में 125 किलोमीटर की दूरी पर और 800 मीटर की गहराई पर मिला है।

इससे एक बात की पुष्टि होती है कि समुद्रमंथन सिर्फ पुराणों में बताई गई कल्पना नहीं, बल्कि सत्य घटना है।