जब भी ऊंचे पहाड़ों की बात आती है, तो प्राकृतिक खूबसूरती उसके साथ जुड़ी होती है। भारत में कई ऐसी जगहें हैं, जहां ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों से ट्रेनें होकर गुजरती है और यह सफर लोगों को जिंदगी भर याद रहता है। चाहे वह माथेरान हो या कोई और हिल स्टेशन, वहां पहुंचने के लिए जिन ट्रेनों का इस्तेमाल किया जाता है, उस का सफर लोग चाहकर भी नहीं भूल पाते। चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़, हरियाली ही हरियाली और ऊंचाई से दूर तक दिखता शहर, ऐसा नजारा है, जिसे कोई भी व्यक्ति रोज-रोज नहीं देख पाता। आज हम आपको एक ऐसी ही रेल यात्रा के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपको बादलों के बीच से लेकर जाती है। घने बादलों के बीच से जब यह रेल यात्रा आप करते हैं, तो आपको स्वर्गीय एहसास होता है। अर्जेंटीना का यह मशहूर पुल आपको ऐसे ही खूबसूरत रेल यात्रा का वादा करता है। आइए जानते हैं इस यात्रा की खासियत।

ट्रेन का नाम है फेमस

एंडीज पर्वत श्रृंखला पर इस पुल को बनाया गया है

आपको जानकर हैरानी होगी कि अर्जेंटीना के पुल से सफर करने वाली यह ट्रेन, ‘ट्रेन टू द क्लाउड’ कहलाती है। इसका अर्थ है बादलों के बीच से होकर गुजरने वाली ट्रेन। दरअसल अर्जेंटीना का यह पुल इतना ऊंचा है कि यदि आप खिड़की से बाहर झांके तो आपको बादल नजर आएंगे। यह ट्रेन लोगों के बीच बेहद फेमस है और इसमें सफर करने के लिए हर साल हजारों सैलानी खास अर्जेंटीना तक का सफर तय करते हैं। एंडीज पर्वत श्रृंखला पर इस पुल को बनाया गया है, जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से 4000 मीटर है। यहां तक कि इस रेलवे ट्रैक को दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे ट्रैक होने का सम्मान प्राप्त है।

यात्रा की खासियत?

इस यात्रा की शुरुआत होती है सिटी सॉल्टा शहर से, इसके बाद यह ट्रेन इस पूरे पुल से होकर गुज़रती है, जिसके चारों ओर बादल ही बादल होते हैं। यह सफर यात्रियों के लिए बेहद रोमांचक साबित होता है। यह ट्रेन 16 घंटे में 217 किलोमीटर का सफर तय करती है। इस पूरी यात्रा के दौरान आपको 29 पुल और 21 टनल से होकर गुजरना पड़ता है।

कब हुई ट्रेन की शुरुआत?

यह ट्रेन सप्ताह में एक बार चलाई जाती है

इस ट्रेन की शुरुआत 1948 यानी कि करीब 71 साल पहले हुई थी।इस पूरी यात्रा में आपको 20 अलग-अलग स्टेशन स्टॉप्स मिलेंगे, जिस पर ट्रेन कुछ समय के लिए रूकती है। जिससे आप यहां के प्राकृतिक नजारों का लुत्फ उठा सकें। इस ट्रेन का आखरी स्टेशन है ला पोल्वोरीला। यह ट्रेन सप्ताह में एक बार चलाई जाती है, जिसके लिए पहले से यात्री टिकट बुक करते हैं। इस ट्रेन को अमेरिकन इंजीनियर रिचर्ड मौर्य ने बनाया था, जिसके बाद इस ट्रेन का इनॉग्रेशन 20 फरवरी 1948 के दिन किया गया।

इतने सालों के बाद भी इस ट्रेन की यात्रा पहले की तरह ही जारी है और लोग इसका लुत्फ़ उठा रहे हैं।

मेरी आवाज़ ही पहचान है! संगीत मेरी कल्पना को पंख देता है.. किताबी कीड़ा, अडिग, जिद्दी, मां की दुलारी.. प्राणी प्रेम ऐसा कि लोग मुझे लगभग पागल समझते हैं! खाने के लिए जीनेवाली और हद दर्जे की बातूनी.. लेकिन मेरा लेखन आपको बोर नहीं करेगा..