भारत जैसे देश मे जहां मेहनत से ज़्यादा कई बार लोग लक और किस्मत पर विश्वास करते है, ऐसे में फिल्म ज़ोया फैक्टर आपको इस बात को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वाकई मेहनत के बिना सिर्फ लक से अपनी मंज़िल पाई जा सकती हैं या फिर क्या सिर्फ बिना लक के मेहनत से सब कुछ हासिल किया जा सकता है? अभिषेक शर्मा की ‘ज़ोया फैक्टर’ क्रिकेट और उससे जुड़े कई अंधविश्वास को बड़े मजेदार तरीके से पेश करती हैं। फ़िल्म में दुलकर सलमान मेहनत और हार्डवर्क में विश्वास रखता है, तो सोनम कपूर लक ओर लकी चार्म है। क्या होता है जब मेहनत और लक आमने सामने आते हैं।

फिल्म की कहानी


Image Credit: Movie – The Zoya Factor Movie Review

फ़िल्म की कहानी एक एड ऐजेंसी में काम करती ज़ोया नाम की लड़की की है, जिसके जन्म के साथ ही भारत ने अपना वर्ल्ड कप जीता था। इसके पापा (संजय कपूर)क्रिकेट के बड़े फैन हैं और इसी वजह से वो उसे क्रिकेट के लिए लकी समझने लगते हैं। हालांकि ज़ोया को क्रिकेट में कोई इंटररस्ट नहीं, लेकिन उसके घर में उसके पापा ओर भाई ज़ोरावर(सिकंदर खेर) के लिए क्रिकेट के सामने कोई कुछ भी नहीं। एड ऐजेंसी में काम करती ज़ोया को एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में भारतीय क्रिकेट टीम के साथ शूट करने का मौका मिलता है और वहीं उसकी मुलाकात भारतीय क्रिकेट टीम के कैप्टन निखिल खोडा यानी दुलकर सलमान के साथ होती हैं। धीरे-धीरे दोनों एक दूसरे के करीब आने लगते हैं। हालांकि लगातार मैच हार रही भारतीय टीम को जैसे ही पता चलता है कि ज़ोया क्रिकेट के लिए लकी है, तो वो उसके लक का फायदा उठाने का मौका नहीं छोड़ते। लेकिन वर्ल्ड कप के लिए मेहनत कर रहा क्रिकेट कप्तान निखिल या फिर लक के फैक्टर से टीम इंडिया को जीता रही ज़ोया, इन दोनों में से, क्रिकेट टीम की जीत का क्रेडिट किसे मिलेगा, यही इस फिल्म का बड़ा सवाल है। लक फेक्टर या फिर मेहनत, आखिर जीत किसकी होगी, इसके लिए दर्शकों को यह फिल्म देखनी होगी।

किरदारों का अभिनय


Image Credit: Movie – The Zoya Factor Movie Review

फिल्म पूरी की पूरी दुलकर सलमान की है। मलयालम फिल्म सुपरस्टार दुलकर आपको इम्पेस करने में कामयाब होगा। अपनी ही टीम में अपने ही मेम्बर से पॉलिटिक्स का शिकार निखिल के रुप में उनका किरदार बेहतरीन है। इसे दुलकर ने काफी कामयाबी के साथ निभाया है। ज़ोया के लिए उसका प्यार हो या फिर अपनी टीम के लिए एक लीडर बनने की उनकी ज़िम्मेदारी, दुलकर ने अपने किरदार के साथ पूरी तरह न्याय किया है।

सोनम कपूर इस फिल्म में ज़ोया का किरदार कर रही हैं, जो क्रिकेट टीम के लिए लक लाती हैं। वह खुद को अनलकी समझती है और उसे इस बात का विश्वास ही नहीं होता कि क्रिक्रेट टीम का कप्तान भला क्यों उसे पसंद करेगा। सोनम ने एक मासूम मिडल क्लास लड़की का किरदार निभाया है, जो अपनी नौकरी बचाने के कुछ भी कर सकती हैं। जल्दी लोगों के बहकावे में आ जाने वाली ज़ोया अपने ही प्यार के खिलाफ तो जाती है, लेकिन आखिर में उसे सच्चे प्यार की कदर होती हैं। अपने इस किरदार को सोनम ने हालांकि बेहतरीन तरीके से निभाने की कोशिश की है, लेकिन दुलकर के सामने उनका अभिनय फीका लगता है।

इन दोनों के अलावा इस फिल्म में सोनम के पिता के किरदार में संजय कपूर और भाई के किरदार में सिकंदर खेर के अलावा अंगद बेदी ने रॉबिन नाम के क्रिकेटर का किरदार निभाया है, जो निखिल के कप्तान बनने से परेशान है और उससे कप्तानी वापस हासिल कर लेना चाहता है।

फिल्म देखें या नहीं


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फिल्म की सबसे खूबसूरत बात है फिल्म में क्रिकेट के दौरान सुनाई देती कॉमेंटरी जो आपको हंसा हंसा कर लोटपोट कर देती हैं। इसके अलावा इस देश में जहां लोग क्रिकेट को प्यार करते है और उसके साथ कई तरह के अंधविश्वास जोड़ देते है, ऐसे में इस फिल्म के साथ बहुत से लोग खुद को जोड़ कर देख सकेंगे। निर्देशक अभिषेक शर्मा के कॉमिक टाइमिंग की दाद देनी होगी। सोनम और दुलकर की केमेस्ट्री काफी बेहतरीन है। फिल्म में शाहरुख खान और अनिल कपूर का सरप्राइज़ पैकेज है, जिसके लिए दर्शकों को थिएटर जाना होगा।

हालांकि फिल्म आपको बांधे रखने में सफल तो होती हैं, लेकिन कहानी में कुछ ऐसी बातें है जिससे दर्शक जल्दी कनवींस नहीं हो पाता, जैसे निखिल और ज़ोया की पहली ही मुलाकात के बाद से बढ़ने वाली नज़दीकिया और क्यों टीम का हर खिलाड़ी मेहनत से ज़्यादा लक और किस्मत का ही सहारा चाहता है। इसके अलावा फिल्म का म्यूज़िक भी एवरेज है। कोई भी गीत आपको याद नहीं रह पाता।

कुल मिलाकर आवाज़.कॉम इस फिल्म को 3 स्टार देता है।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।