वन डे:जस्टिस डिलीवर्ड जैसा नाम से ही अंदाज़ा हो जाता है कि यह कहानी लोगों को न्याय दिलाने को लेकर ही आधारित होगी। अशोक नंदा निर्देशित 124 मिनट की यह फिल्म एक अच्छी कहानी ज़रुर है, लेकिन फिल्म आपको बांधे रखने में कामयाब नहीं होती। फिल्म में आते टर्न और ट्विस्ट आपको कनवींस नहीं कर पाते हैं। फिल्म आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि क्या न्याय पाने या न्याय दिलाने के लिए किसी भी हद तक जाया जा सकता है?

Movie Story


Image Credits: Movie – One Day Justice Delivered

कहानी रिटार्यड जस्टिस त्यागी यानी अनुपम खेर की है,जो जज के पद से रिटायर होने के बाद, कानून को अपने हाथ में लेने से घबराता नहीं। दरअसल, बतौर जज सबूतों के अभाव के कारण उसे कई ऐसे लोगों को भी छोड़ देना पड़ता है, जो वाकई में अपराधी थे। कानून के दायरे में रह कर किए गए इन फैसलों को, वो रिटायरमेंट बाद के सुधारना शुरु करता है। इसी सिलसिले में वो हर उस अपराधी को किडनैप करता हैं, जिसे उसने जज रहते हुए छोड़ दिया था। शहर में एक के बाद एक होती किडनैपिंग की जांच के लिए एक स्पेशल क्राइम ब्रांच अफसर लक्षमी राठी यानी ईशा गुप्ता को नियुक्त किया जाता है। क्या कानून अपने हाथ में लेकर लोगों को न्याय दिलाने की जस्टिस त्यागी की यह कोशिश सही है या नहीं, यह आपको फिल्म देख कर ही पता लगेगा।

फिल्म के किरदार


Image Credits: Movie – One Day Justice Delivered

अनुपम खेर एक बेहतरीन कलाकार है इस बात में कोई दो राय नहीं। इस फिल्म में भी उनका किरदार बेहतरीन है, लेकिन जब निर्देशक और कहानी में ही दम ना हो तो एक अच्छा कलाकार भी कुछ नहीं कर सकता। इस फिल्म के दूसरे मुख्य किरदार की बात करें तो वो है ईशा गुप्ता। ईशा इस रोल के लिए बिल्कुल फिट नहीं लगती। उनकी भाषा,बोली और थोड़े बहुत एक्शन से यह नहीं बताया जा सकता कि वह एक क्राइम अफसर है। फिल्म में उनकी एंट्री एक डांस बार में नाचने और गाने से होती है। एक अपराधी को पकड़ने के लिए वहां अपनी पहचान छिपा कर डांसर के रुप में आई ईशा का फिल्म में इंट्रोडक्शन ही काफी हास्यास्पद लगता है। फिल्म में कुमुद मिश्रा जैसे किरदार, हालांकि फिल्म में समय- समय पर जान डालने की कोशिश करते हैं, लेकिन जैसा कि हम पहले ही बता चुके है कि अगर कहानी में ही दम ना हो तो भला एक्टर भी क्या करेंगे।

फिल्म देखें या नहीं


Image Credits: Movie – One Day Justice Delivered

एक के बाद एक लोग शहर में गायब हो रहे है, किसी को खुछ पता नही चलता यह बात वाकई अजीब लगती हैं। इतना ही नहीं खुद जज रह चुके जस्टिस त्यागी, न्याय के लिए और भी तरीके अपना सकते थे, भला कानून और न्याय को जानने वाले को, खुद अपराध करने की क्या ज़रुरत थी। इतना ही नहीं फिल्म के निर्देशक को शायद आईटम सोंग से इतना प्यार है कि फिल्म में एक नहीं, बल्कि तीन है और वो भी ऐसे मोड़ पर जहां इसकी कोई ज़रुरत नहीं है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि महिला सशक्तिकरण को फिल्मों में दिखाए जाने का दौर ज़रुर चल रहा हैं, लेकिन इसका यह तमलब बिल्कुल नहीं कि इसके लिए मर्दों को नीचा दिखाया जाए। इस फिल्म में कई ऐसे मौके महसूस होते है, जहां फिल्म के महिला किरदार यानी ईशा के किरदार को ऊंचा दिखाने के लिए, फिल्म के मर्द किरदारों को कमतरी दिखाया गया है। हालांकि फिल्म के आखिर में आता सस्पेंस बेहतरीन जरुर है, लेकिन तब तक दर्शक इतना ऊब जाते है कि वो शायद ही इस सस्पेंस का इंतज़ार करें।

आवाज़ डॉट कॉम इस फिल्म को डेढ़ स्टार सिर्फ और सिर्फ अनुपम खेर के अभिनय के लिए देता हैं।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।