भारत की छोटी से छोटी उपलब्धियों पर हर भारतीय को गर्व है। जब बात हो मार्स यानी मंगल पर पहला अंतरिक्ष यान भेजने की, तो वो भारत की ऐसी उपलब्धि है जिस पर हर भारतीय को गर्व है। ऐसे ही एक गौरवशाली विषय पर निर्देशक जगन शक्ति फिल्म लेकर आए है ‘मिशन मंगल’। इस फिल्म में अक्षय कुमार सहित, विद्या बालन, तापसी पन्नू, कीर्ती कुल्हारी, सोनाक्षी सिन्हा, नित्या मेनन, शर्मन जोषी और दलिप ताहिल जैसे कई कलाकार देखने को मिलेंगे, जो इस फिल्म में इसरो से जुड़े वैज्ञानिक की भूमिका निभा रहे हैं।

फिल्म की कहानी


Image Credit: Movie- Mission Mangal

फिल्म शुरु होती है श्रीहरिकोटा में GSLV-FAT BOY का परीक्षण असफल हो जाने से। जिसके बाद, इसरो और उसकी कार्यप्रणाली पर कई तरह के सवाल उठते है। कड़ी मेहनत के बावजूद इस मिशन का फेल होना, ना सिर्फ देश के लिए नुकसानायक बात थी, बल्कि पूरे विश्व में भारत की काबिलीयत पर सवाल उठने लगे। ऐसे में भारत के पास एक और मौका था, मार्स पर पहुंच कर खुद की काबिलियत साबित करने का। ऐसे में GSLV-FAT BOY पर काम कर रहें वैज्ञानिक अक्षय कुमार यानी राकेश और विद्या बालन यानी तारा मिलकर इस बात का निर्णय लेते है कि वो दो साल में किसी भी तरह कम कीमत पर एक सेटेलाइट तैयार कर उसे मार्स पर भेजेंगे। सुनने में नामुमकिन लगते इस प्लान को इसरो की टीम कैसे अंजाम देती है, इस पर ही बनी है फिल्म ‘मिशन मंगल’।

दरअसल, इस फिल्म में इसरो के अंदर ही आपस की जलन और खुद अपने ही लोगों का, देश के वैज्ञानिकों पर विश्वास ना होने के पहलू को इस फिल्म दिखाया गया है। जहां विश्व के बड़े -बड़े देश करोड़ो रुपए लगा कर भी मार्स तक पहुंचने का सपना पूरा नहीं कर पाए थे, तब साल 2013 में भारत ने महज 700 करोड़ में मार्स पर अपना यान भेजा, जो 24 सितम्बर 2014 को मार्स पहुंच गया था। कैसे इसरो की एक टीम के विश्वास ने भारत को मार्स पहुंचने वाला पहला देश बनाया, कैसे इस पूरे मिशन को अंजाम दिया गया, इसके पीछे के लोगों की मेहनत को इस फिल्म में दिखाया गया है।

फिल्म के  किरदार


Image Credit: Movie- Mission Mangal

फिल्म के किरदारों में सबसे अहम है अक्षय कुमार या किरदार। उन्होनें इस फिल्म में मुख्य वैज्ञानिक राकेश के किरदार को निभाया है। हम अक्सर सुनते है कि साइंटिस्ट अपनी ही धुन में रहते हैं,  लेकिन इस फिल्म में अक्षय का किरदार भी हमेशा फिल्मों के गीत ही गुनगुनाता दिखेगा, वह अपनी धुन का पक्का और सिर्फ काम में डूबा हुआ साइंटिस्ट है। इसके साथ ही उनके साथ काम करने वाली तारा, परिवार और इसरो के काम के बीच उलझी है, विज्ञान में जितना विश्वास रखती है, भगवान में भी उसकी उतनी ही श्रद्धा है। बड़े हो चुके बच्चों की फ्रीडम में वो दखल नहीं करती, लेकिन समय आने पर उन्हें सीख देने में भी पीछे नहीं रहती। शरमन जोशी है तो वैज्ञानिक, लेकिन मंगल पर यान भेजने से पहले वह अपने ही मंगल से परेशान है क्योंकि उनकी कुंडली पर मंगल ग्रह भारी है और अभी तक उनकी शादी नहीं हुई है। नित्या का किरदार शादीशुदा है, लेकिन बच्चा ना हो पाने के सास के तानों0 से परेशान, सोनाक्षी भारत में नहीं, बल्कि विदेश में नासा के साथ काम करना चाहती हैं, तो तापसी का किरदार शादीशुदा है और पति की सेवा को देश की सेवा से ऊपर मानता है, वहीं कीर्ति कुल्हारी का किरदार अपने पति को छोड़ चुका है, मुस्लिम है और इसलिए उसे कही पर भी अकेले घर नहीं मिल पाता।

हर किरदार की इस छोटी-छोटी चीज़ों को निर्देशक ने इस फिल्म में खूबसूरत तरीके से दिखाया है। इसके अलावा फिल्म में कई ऐसे छोटे-छोटे मुद्दे है, जिनको निर्देशक ने अपने किरदारों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की है। दरअसल, निर्देशक इन किरदारों के माध्यम से यही दिखाना चाहते थे कि मंगल पर यान भेजने वाले वैज्ञानिक भी आपकी और हमारी तरह आम है, जिन्हें अपनी रोज़ की ज़िंदगी में भी उन्ही सब चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो अक्सर आपको और हमको भी करना पड़ता है। वह देखने में खास नहीं होते, बल्कि अपने काम से वो खास बन जाते हैं।

फिल्म देखें या नहीं


Image Credit: Movie- Mission Mangal

फिल्म की सबसे खास बात है कि विज्ञान को आम ज़िंदगी से जोड़ कर दिखाया गया है। आप अक्सर लोगों से सुनते होंगे कि हमारे आस-पास ही विज्ञान है। ऐसी ही तरकीबों और उपायों के साथ, इसरो की टीम मंगल पर यान भेजने को तैयार हो जाती हैं। इसरो का ज़ज़्बा, जुनून और देश के लिए कुछ करने की भावना आप में भी देशभक्ति जगा देगी।

इसरो कैसे काम करता है,  उससे जुड़े लोगों की सोच क्या है, जैसी कई चीज़े इस फिल्म में देखने को मिलेंगी, ऐसी उम्मीद के साथ दर्शक थिएटर जाएगा, तो उसे निराशा हाथ लग सकती हैं। फिल्म के आखिर के 15 से 20 मिनट को छोड़कर, यह फिल्म इसमें काम कैसे किया जाता है ये ज़्यादा इसमें काम करने वाले किरदारों की कहानी ज़्यादा लगती है। हालांकि फिल्म में कौन सा किरदार मंगलयान को मार्स तक पहुंचाने के लिए क्या काम करता है यह फिल्म में बहुत डिटेल में नहीं जान पाते। फिल्म खत्म होने के बाद आपको लगता है कि इन सभी वैज्ञानिकों के काम के बारे में थोड़ा और अच्छे से दिखाया होता तो बेहतर होता। दरअसल, इन किरदारों की पर्सनल लाइफ की जगह, इसरो में उनके काम, उनकी कठिनाईयों को और ज़्यादा दिखाया जा सकता था।

दरअसल, 15 अगस्त 1969 में इसरो की स्थापना हुई थी जिसे इस साल 50 साल पूरे हुए है। यह फिल्म उसी का जश्न है। इस बात में कोई दो राय नहीं, कि यह फिल्म आप को अपने देश पर गर्व महसूस कराती है। फैमिली फिल्म होने के चलते,इस फिल्म का मज़ा इन छुट्टीयों में अपने परिवार के साथ लिया जा सकता है। इस फिल्म को देखकर बहुत से बच्चे साइंटिस्ट बनने के लिए प्रेरित हो सकते हैं।

आवाज़ डॉट कॉम इस फिल्म को 3.5 स्टार देता है।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।