‘कबीर सिंह’ जैसा कि फिल्म के टाइटल से ही साफ है कि यह कहानी सिर्फ और सिर्फ फिल्म के हीरो के इर्द गिर्द ही घूमती नज़र आएगी। कबीर सिंह यानी शाहिद कपूर की ज़रुरतें, उसका गुस्सा, उसकी सोच और उसके स्वाभिमान और उसकी सनक की कहानी। फिल्म ‘कबीर सिंह’ एक ऐसी इंटेंस लवस्टोरी है, जो शायद ही बॉलीवुड में बनी हो। संदीप रेड्डी वांगा निर्देशित कबीर सिंह उनकी दो साल पहले रिलीज़ हुई फिल्म तेलुगू फिल्म अर्जुन रेड्डी की हिन्दी रीमेक हैं। फिल्म में आपको दक्षिण भारतीय फिल्मों का स्टाइल और अंदाज़ देखने को मिलेगा।

फिल्म की कहानी

मेडिकल के सबसे बड़े कॉलेज का टॉप स्टूडेंट कबीर सिंह कॉलेज की शान है, लेकिन उसका गुस्सा भी उतना ही मशहूर है, जितना की उसका टैलेंट। कॉलेज की जूनियर स्टूडेंट प्रीति (कियारा आडवाणी) को पहले दिन देखते ही वह उसके प्यार में पड़ जाता है। धीरे-धीरे दोनों करीब आते हैं, लेकिन कबीर अपने गुस्से और स्वभाव की वजह से उसे खो देता हैं। अपने प्यार को खोने के बाद उसे अपनी गलती का एहसास होता हैं लेकिन तब तक वो गलत रास्तों पर निकल पड़ता है। एक सक्सेसफुल सर्जन जो कभी भी अपने मरीज़ो पर भी चिल्ला पड़ता है, लेकिन फिर भी ज़िंदगी में उसे प्रीति के बाद अगर किसी चीज़ से प्यार है तो वो है उसका पेशा डॉक्टरी। प्रीति को खो चुके कबीर को क्या प्रीति मिलती है? यही इस फिल्म की कहानी हैं.

फिल्म के किरदार

कबीर यानी शाहिद के किरदार के वायलंस को कई जगहों पर बहुत ही ज़्यादा ग्लोरीफाइड किया गया है। प्यार, पागलपन और सनक में अंतर होता है। कबीर सिंह का प्यार उसके लिए धीरे-धीरे पागलपन और फिर उसकी सनक बन जाता है। हालांकि गुस्सैल कबीर आज के दौर का लड़का है इसलिए वह काफी प्रेक्टिल सोच रखता हैं। 2019 में पहुंच चुके उस दौर में वह लड़कियों पर पाबंदी और अपनी गर्लफ्रैंड के साथ रिश्ते छिपाने की जगह, उसे खुले आम एक्सेप्ट करने में विश्वास करने वाले युवा का प्रतिनिधित्व कर रहा है। दरअसल, कबीर सिंह जैसे कई युवा इस समाज में शामिल है, लेकिन उन्हें अधिकतर स्टॉकर या फिर सनकी की उपाधि दे दी जाती हैं। कबीर सिंह फिल्म में भी कबीर की सनक को कई जगह दर्शक जस्टिफाई नहीं कर पाएंगे। अपनी ही गर्लफ्रेंड को थप्पड़ मारना हो या फिर कई जगहों पर किरदार की शारीरिक भूख शांत करने की उसकी तड़प से कई बार ऐसा एहसास होता कि कबीर को लव की नहीं,बल्कि लस्ट की ही तलाश हैं। फिल्म में जहां इस किरदार को सनकी दिखाया है, वहीं इस किरदार के कई मोरल वेल्युस भी दिखाए हैं, सही के लिए खड़ा होना, आवाज़ उठाना , चुप ना रहना और अपने हक के लिए बोलना जैसी कई बातों में विश्वास रखते कबीर सिंह का वो पहलू भी दर्शकों को पसंद आएगा। हालांकि इस बात में कोई दो राय नहीं कि अगर कबीर सिंह के किरदार में शाहिद ना होते तो शायद इस किरदार को लगभग 3 घंटा झेल पाना मुश्किल था। इससे पहले भी हम ‘उड़ता पंजाब’ और ‘हैदर’ जैसी फिल्मों में शाहिद के इस अंदाज़ को देख चुके है, लेकिन जिस तरह से उन्होनें अपने इस किरदार कबीर सिंह में खुद को ढाला है, वह बेहतरीन है। उसके इस किरदार को उनके करियर का बेस्ट किरदार कहना गलत नहीं होगा।

प्रीति यानी कियारा ने मेडिकल स्टूडेंट का किरदार निभाया है, जो शाहिद के कॉलेज में पढ़ने आती है और उसकी जूनियर है। पहले ही दिन से सहमी और खामोश प्रीति के किरदार को काफी डरा-डरा सा फिल्म में दिखाया गया है। हालांकि मेडिकल की पढ़ाई करने और दिल्ली के हॉस्टेल में अकेले रहने आई लड़की का शुरुआत से ही इतना सहमा रहना समझ नहीं आता। शाहिद पर उनका गुस्सा, परिवार के आगे चुप्पी जैसी कई चीज़े है जो आपको प्रीति के किरदार में अधूरी लगती हैं, लेकिन फिल्म के आखिर में प्रीति और कबीर के बीच की बातचीत के बाद आपको कही ना कही उस किरदार को समझने में मदद ज़रुर मिलती है, लेकिन फिर भी आप पूरा जस्टिफाई नहीं कर पाते। दरअसल, फिल्म में जिस तरह से हीरोईन के किरदार को पेश किया गया है, उससे एक बात साफ है कि यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ इस फिल्म के हीरो की है, फिल्म में हीरोइन कौन होगी इस बात का फिल्म पर कोई असर नहीं होता।

शाहिद और कियारा के साथ एक और दमदार किरदार इस फिल्म में है और वो है शाहिद के दोस्त शिवा (सोहम मजूमदार)का । कॉलेज में हर सही और गलत में अपने दोस्त कबीर का साथ देने वाला शिवा आखिर तक उसका साथ निभाता है। दरअसल, कैसे एक सनकी सर्जन का जब सभी साथ छोड़ देते हैं, तो शिवा जैसा उसका दोस्त बिना उसे जज किए उसका साथ निभाता है। दरअसल, सोहम ने जिस तरह से इस किरदार को निभाया है वह बेहतरीन हैं। फिल्म में शाहिद और सोहम के बीच जो दोस्ती नज़र आती हैं वह दर्शकों को काफी पसंद आएगी।

इसके अलावा फिल्म में सुरेश ओबेरॉय ने शाहिद के पिता, अर्जुन बाजवा ने शाहिद के बड़े भाई और कामिनी कौशल ने दादी की भूमिका निभाई है। कबीर और उसकी दादी के बीच के भले ही एक या दो सीन्स हो, लेकिन वह सीन्स आपका दिल छू लेते हैं।

फिल्म देखें या नहीं

फिल्म का फ़र्स्ट हॉफ काफी बेहतरीन है। हालांकि फिल्म के सभी गीत तो फिल्म की रिलीज़ से पहले ही हिट हो चुके थे और फिल्म में भी गीत फिल्म को आगे बढ़ाते है। फिल्म में शाहिद को जिस तरह का लुक दिया गया है, वह उनके किरदार को साथ सूट करता है। फिल्म की सिनेमाटोग्राफी और निर्देशन कमाल का है। फिल्म थोड़ी लम्बी है और खास कर ब्रेक के बाद काफी खींची हुई लगती है। फिल्म को आसानी से कई जगहों पर छोटा किया जा सकता था।

हालांकि इस फिल्म को आवाज़ डॉट कॉम साढ़े तीन स्टार देता हैं।

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