भारत में अक्सर आपने देखा होगा कि बच्चों के पैदा होने के कुछ ही समय बाद उनके कान छिदवाए जाते हैं। कान छिदवाने की यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। प्राचीन काल की बात करें, तो राजा-महाराजाओं के ज़माने में सिर्फ महिलाएं ही नहीं, बल्कि पुरुष भी कान छिदवाया करते थे और कानों में बालियां पहना करते थे। लेकिन समय के साथ लोगों में इसे लेकर ट्रेंड बदल गया है और इसीलिए सिर्फ महिलाओं को कान छिदवाते हुए देखा गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कान छिदवाना सिर्फ हमारी परंपराओं का ही हिस्सा नहीं, बल्कि इसका महत्व हमारे सेहत से भी जुड़ा हुआ है। अगर यकीन नहीं आ रहा हो, तो आपको इस खबर को ज़रूर पढ़ना चाहिए। क्योंकि आज हम आपको कान छिदवाने के पीछे वैज्ञानिक कारणों के बारे में बताएंगे, जो हमारी सेहत को अलग अलग तरह से फायदा पहुंचाती है।

ज़रूरी पॉइंट्स होते हैं कान से जुड़े

कान का आखिरी हिस्सा, जिसे बाहरी भाग भी कहा जाता है, इसका मध्य भाग हमारे शरीर का अहम पॉइंट होता है

एक्यूप्रेशर स्पेशलिस्ट यामिनी टांक कहती हैं, “भारत में अलग-अलग चिकित्सा प्रणालियां प्रचलित हैं। इसमें आयुर्वेद, होम्योपैथी, एलोपैथी, एक्यूप्रेशर जैसी कई तरह के इलाज लोग करते हैं। इनमें से एक्यूप्रेशर एक ऐसी थेरेपी है, जो हमारे शरीर के महत्वपूर्ण पॉइंट्स के अनुसार समस्या का इलाज करती है। एक्यूप्रेशर में माना जाता है कि कानों में पूरे शरीर के पॉइंट्स मौजूद होते हैं। यही वजह है कि इन पॉइंट्स पर दबाव बना कर इम्युनिटी को बढ़ाया जाता है। उसी तरह कान का आखिरी हिस्सा, जिसे बाहरी भाग भी कहा जाता है, इसका मध्य भाग हमारे शरीर का अहम पॉइंट होता है। यह हिस्सा हमारी प्रजनन प्रणाली से जुड़ा हुआ है, इसीलिए एक्यूप्रेशर में यह कहा गया है कि कान छिदवाने से महिलाओं को महावारी में होने वाली समस्या नहीं होती और मेंस्ट्रूअल सायकल सही तरह से काम करता है। साथ ही आप महावरी के दौरान स्वस्थ रहती हैं।”

मस्तिष्क का विकास

आपने अक्सर भारत में लोगों को देखा होगा कि बच्चों के जन्म के कुछ ही समय में उनके कान छिदवा दिए जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि कान छिदवाने से मस्तिष्क का विकास अच्छी तरह से होता है। कान का बाहरी हिस्सा एक ऐसा पॉइंट माना जाता है, जो ब्रेन के दोनों भागों को जोड़ता है। कान के इस हिस्से में यदि छेद करवाया जाए, तो ब्रेन के दोनों हिस्से एक्टिव हो कर अच्छी तरह से काम करते हैं। एक्यूप्रेशर थेरेपी में यही कहा गया है कि कान में छेद करा कर इस प्वाइंट को सक्रिय किया जाता है,जिससे ब्रेन स्वस्थ भी रहता है और बच्चे का दिमाग तेज़ बनता है।

आंखों के स्वास्थ्य पर असर

कान के इस हिस्से में यदि छेद करवाया जाए, तो ब्रेन के दोनों हिस्से एक्टिव हो कर अच्छी तरह से काम करते हैं

यदि हम आपसे कहे कि कान से आपकी आंखों का स्वास्थ्य का जुड़ा हुआ है, तो क्या आप यकीन करेंगे। कान का सेंटर पॉइंट, जिसे लोग छिदवाते हैं, आंखों की रोशनी पर इसी पॉइंट का प्रभाव पड़ता है। इस पॉइंट में यदि छेद करवाया जाए, तो इसके प्रेशर के कारण आंखों की रोशनी बेहतर होती है और आपकी आंखें संक्रमण से मुक्त रहती हैं।

कानों पर भी पड़ता है असर

आंख, नाक और कान एक दूसरे से पूरी तरह जुड़े हुए होते हैं। इसीलिए कान में यदि छेद करवाया जाए, तो इससे सुनने की क्षमता भी तेज़ होती है। कान में छेद करवाने से जिस एक्यूप्रेशर पॉइंट पर वजन पड़ता है, उससे सुनने की क्षमता भी बढ़ती है और कानों से जुड़ी हुई कई समस्याओं से छुटकारा मिलता है। इसीलिए कानों में यह छेद होना बेहद जरूरी है।

यदि आपने अब तक कान नहीं छिदवाए हैं, तो आप इसके बारे में सोच सकते हैं।

मेरी आवाज़ ही पहचान है! संगीत मेरी कल्पना को पंख देता है.. किताबी कीड़ा, अडिग, जिद्दी, मां की दुलारी.. प्राणी प्रेम ऐसा कि लोग मुझे लगभग पागल समझते हैं! खाने के लिए जीनेवाली और हद दर्जे की बातूनी.. लेकिन मेरा लेखन आपको बोर नहीं करेगा..