जून 18 को दुनिया भर में ‘ऑटिज्म प्राइड डे’ के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन ख़ास तौर पर इस बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है। ऑटिज्म दरअसल एक मानसिक बीमारी है जो बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित करती है। इस बीमारी से पीड़ित बच्चों का मानसिक विकास स्वस्थ बच्चों की तुलना में बेहद धीमा होता है। जैसे-जैसे बच्चों की उम्र बढती है ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों में इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं ? तो आइए एक्सपर्ट्स से जानते हैं क्या हैं ऑटिज्म के लक्षण ? और क्या है इस बीमारी का इलाज

क्या है ऑटिज्म

भोपाल के डॉक्टर योगेश मल्होत्रा के मुताबिक, ऑटिज्म एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है। यह बीमारी बच्चों नें जन्म से ही होती है, हालांकि शुरूआती दो से तीन साल तक इस बीमारी के लक्षण सामने नहीं आ पाते हैं। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है इसके लक्षण दिखाई देने लगता हैं। कुछ सामान्य लक्षण जो इस बीमारी में दिखते हैं वह इस प्रकार हैं।

बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित करता है ऑटिज्म

ऑटिज्म के सामान्य लक्षण

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बच्चे का असामान्य व्यवहार, मसलन, मां और पिता को आवाज़ से ना पहचान पाना। खोया-खोया सा रहना, शब्दों को सुनकर किसी भी प्रकार का व्यावहारिक रिएक्शन ना देना, गोद में लेने पर शरीर का अकड़ जाना आदि। इसके अलावा अगर जब आप बच्चे से हंसकर कुछ कहें और वह उस पर कोई रिएक्शन न दे, अपने खिलौनों को खेलते वक्त एक क्रम से न लगा सके। बच्चा बहुत देर तक कुछ न बोले और अगर बोले भी तो एक ही शब्द को बार-बार रटकर लगातार बोलता ही जाए, अपने हाथ-पैर बार-बार ऐंठकर बैठे या लेट जाए तो भी ये ऑटिज्म के लक्षण हो सकते हैं।

इसके अलावा ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे औरों की नकल उतारने में सहज नहीं होते। जबकि बढ़ते बच्चों में अक्सर यह देखा जाता है कि वह अपने आसपास के लोगों की नकल उतारने में माहिर होते हैं क्योंकि इससे उन्हें सीखने में मदद मिलती है। इसके अलावा पैदा होने के कुछ समय बाद ही बच्चा आई कांटेक्ट बनाने लगता है, छह महीने का होने तक वह कुछ कुछ बोलने की कोशिश भी करने लगता है लेकिन काफी वक्त बीत जाने के बाद भी बच्चा अपना नाम या माता-पिता का नाम ना पुकारे और कोई कनेक्शन ही ना रखे तो यह खतरे की घंटी हो सकती है और पेरेंट्स को तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

क्या है ऑटिज्म का कारण

मेडिकल एक्सपर्ट्स की मानें तो ऑटिज्म रोग का सटीक कारण अज्ञात है। वहीं कुछ एक्सपर्ट्स इसे अनुवांशिक और महिलाओं में थायरॉएड हॉरमोन की कमी के तौर पर भी देखते हैं। हाल ही में पब्लिश हुई कुछ मेडिकल स्टडीज में यह भी बताया गया है कि गर्भावस्था के दौरान पोषक तत्वों की कमी के चलते बच्चों में ऑटिज्म की समस्या देखने को मिल रही है

ऑटिज्म से जुड़े कुछ अन्य फैक्ट्स

लड़कियों की तुलना में ऑटिज्म रोग लड़कों में चार गुना अधिक पाया जाता है।

रिसर्च से पता चलता है कि ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्तियों की मृत्यु दर सामान्य व्यक्तियों की तुलना में दोगुनी है।

प्रत्येक 68 में से एक बच्चा ऑटिज्म रोग से पीड़ित है।

ऑटिज्म से पीड़ित 40 % बच्चे या तो बोल नहीं पाते या फिर इन्हें बोलने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

ऑटिज्म से पीड़ित अलग-अलग व्यक्तियों में इस बीमारी से जुड़े अलग-अलग लक्षण देखने को मिलते हैं।

ऑटिज्म के इलाज की अलग-अलग पद्धति

बिहेवियर थैरिपी

ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए एक्सपर्ट्स ने अलग -अलग पद्धति की थैरिपीज सुझाई हैं। इनमें से सबसे प्रचलित है बिहेवियर थेरेपी। इसके अंतर्गत बच्चों को कुछ एक्सपेरिमेंट्स के जरिए व्यवहार करने के बेसिक नियम सिखाये जाते हैं। जैसे किन्हीं शब्दों को सुनकर कैसे रियेक्ट करना है। माता-पिता को कैसे पहचानना है, अपनी बात को कैसे सामने वाले को समझाना है आदि। ऑटिज्म से पीड़ित बड़े बच्चों की एजुकेशन के लिए भी इसी प्रकार की थेरेपी हैं जिसके अंतर्गत उन्हें रूचि अनुसार विषयों को एक्सपर्ट की देखरेख में पढ़ाया जाता है। ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों में अक्सर, गुस्सा और चिढ़चिढ़े की शिकायत देखने को मिलती है। यदि आपको भी बच्चों में ऐसे कोई लक्षण दिखाई दें तो तत्काल अपने डॉक्टर को इस बारे में सूचित करें। इन लक्षणों की रोकथाम के लिए डॉक्टरों द्वारा दवाई दी जाती है

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