‘कबा गांधी नो डेलो’, का अर्थ है ‘कबा गांधी का घर’, यानी एक ऐसी जगह है जहां महात्मा गांधी ने अपने जीवन के शुरुआती कई साल बिताए थे। दरअसल, गांधीजी के पिता करमचंद गांधी को कबा के नाम से भी जाना जाता था और इसलिए उनका यह घर कबा गांधी के घर के नाम से जाना जाता था।। राजकोट की एक सकरी सी गली घी कांता रोड पर स्थित, इस घर का निर्माण 1880-81 में हुआ था। यह घर महात्मा गांधी के पिता करमचंद उत्तचंद गांधी के नाम पर है। महात्मा गांधी के पिता करमचंद उत्तचंद गांधी राजा के दरबार में दीवान हुआ करते थे। गांधी के अनुयायियों के लिए यह जगह किसी मंदिर से कम नहीं है। गांधी जयंती के मौके पर आज हम आपको इस घर के बारे में दिलचस्प बातें बताने जा रहे हैं।

गांघी को समझने में मदद करता है यह घर

सौराष्ट्र शैली में बनाया गया था आर्किटेक्चर

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‘कबा गांधी नो डेलो’ एक खूबसूरत घर है, जिसमें महात्मा गांधी के शुरुआती जीवन की झलक नज़र आती है। इस घर के दरवाज़े धनुष के आकार के हैं, इसका आर्किटेक्चर सौराष्ट्र शैली में बनाया गया है और इसमें खूबसूरत आंगन भी हैं। आज यहां एक म्यूज़ियम के तौर पर पर्यटकों के लिए खुला रहता है। इस सुंदर घर में महात्मा गांधी से जुड़ी कई अमूल्य चीज़ें भी हैं, जैसे उनकी तस्वीरें, वस्तुएं और उनका निजी सामान। इस घर के दीवानखाने में महात्मा गांधी की यात्रा को दर्शाती बहुत सी तस्वीरें लगी हुई हैं। चूंकि महात्मा गांधी को चरखा बहुत पसंद था, इसलिए इस घर में हथकरघा बुनाई की एक छोटी सी शाला भी बनाई गयी है। ‘कबा गांधी नो डेलो’ वर्तमान में गैर-सरकारी संगठन यानी एनजीओ द्वारा सम्भाला जाता है, जो युवा लड़कियों को कढ़ाई और बुनाई सिखाते हैं। यदि आप महात्मा गांधी के अनुयायी हैं या इतिहास में रूचि रखते हैं, तो आपका यहां ज़रूर जाना चाहिए।

सत्य और अंहिसा का पाठ यही रहते हुए सीखा

7 से 22 वर्ष की आयु तक यहां किया जीवन व्यतीत

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अपनी युवावस्था में उन्होंने ज़्यादातर समय यहीं बिताया था। इसी दौरान उन्होंने इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका की यात्रा भी की थी। भले ही पोरबंदर उनकी जन्मभूमि हो और अहमदाबाद उनकी कर्मभूमि, लेकिन उनकी संस्कारभूमि के तौर पर राजकोट को जाना जाता है। दरअसल, अपनी जिदंगी के दो अहम मूल्य, सत्य और अहिंसा का पाठ उन्होंने यहीं राजकोट में रहते हुए ही सीखा था। गांधी ने अपनी आत्मकथा में भी ज़िक्र किया है कि उन्हें अपने काम के लिए बहुत बार ज़ोर से डांट और फटकार की भी उम्मीद होती थी, लेकिन उनके पिता अहिंसा का मार्ग चुनकर उन्हें सही रास्ता सिखाते थे और यही मार्ग गांधी ने भी जीवनभर अपनाया।

महात्मा गांधी अपने जीवन के हर पड़ाव में अपने मज़बूत व्यक्तित्व से लोगों को प्रेरणा दी है। जहां गुजरात के पोरबंदर को उनकी जन्मभूमि माना जाता है, वहीं अहमदाबाद के साबरमती आश्रम को उनकी कर्मभूमि। लेकिन मोहनदास से महात्मा बनने का सफर उन्होंने जहां तय किया, ऐसे राजकोट शहर में आपको ज़रुर जाना चाहिए।

अपने सपनो को पूरा करने की ताक़त रखती हूँ। अभिलाषी हूं और नई चीज़ों को सीखने की इच्छुक भी। एक फ्रीलान्स एंकर। मेरी आवाज़ ही नहीं, बल्कि लेखनी भी आपके मन को छू लेगी। डांसिंग और एक्टिंग की शौक़ीन। माँ की लाड़ली और खाने की दीवानी।