रोटी, जिसके बिना हमारा खाना अधूरा रह जाता है। कोई भी भारतीय खाना बिना रोटी के अधूरा है। मटर पनीर हो, बैंगन का भर्ता हो या फिर दाल मखनी ही क्यों ना हो, किसी का भी स्वाद बगैर रोटी के अच्छा नहीं लगता। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रोटी खाने की शुरुआत कैसे हुई? और तो और रोटी कितने देशों की यात्रा करके हमारे देश का अभिन्न हिस्सा बन गई? आज हम आपको रोटी के इतिहास और इससे जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में बताएंगे।

कहां मिली सबसे पुरानी रोटी?

उस दौर में गेहूं को भिगो कर उसे पीस दिया जाता था और उससे गेहूं की पिठ्ठी बनाकर अलग-अलग आकार में रोटियां बनाई जाती थी

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रोटी का इतिहास ऐसा है, जिसे सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। करीब 35 सौ वर्ष पहले मिस्र में रोटी मिलने का प्रमाण मिला है। दरअसल कुछ समय पहले 35 सौ वर्ष पुरानी कब्र में एक टोकरी में अलग-अलग तरह की रोटियां रखी हुई पाई गई थी। यह कब्र एक स्त्री की थी, इसके बाद इस टोकरी को न्यूयॉर्क के एक संग्रहालय में रखा गया। साथ ही यहां कई ऐसी कब्रें मिली थी, जिनमें रोटियां रखी गई थी। इतिहासकारों की मानें, तो इससे यह साफ पता चलता है कि उस समय सिक्कों की जगह पर रोटियों का लेन-देन हुआ करता था।

कैसे बनाई जाती थी रोटी

वह दौर ऐसा था जब नौकरों से लेकर सैनिकों तक को वेतन के रूप में रोटियां मिलती थी। हालांकि उस वक्त रोटी बनाने की कला लोगों के पास नहीं थी, इसलिए उस दौर में गेहूं को भिगो कर उसे पीस दिया जाता था और उससे गेहूं की पिठ्ठी बनाकर अलग-अलग आकार में रोटियां बनाई जाती थी। कुछ समय बाद आटे की रोटियां बनने लगी। इतिहासकार हेरोडोटस की माने, तो मिस्र में लोग हाथ से नहीं, बल्कि पैरों से आटा गूंदा करते थे। मिस्र में रोटी का कारोबार करीब 2000 वर्ष पूर्व शुरू हुआ था, लेकिन उस वक्त यहां खमीर की रोटी बनाई जाती थी।

ऐसा रहा रोटी का सफर

यहूदी भी रोटी के कला मिस्र से लेकर आए हैं

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रोटी का सफर यहीं खत्म नहीं हुआ। रोटी की कला विकसित करने में रोम के लोगों का बड़ा योगदान रहा है। रोम में रहने वाले लोगों ने ही आटा गूंदने और पीसने की मशीन ने बनाई, जिसे उस जमाने में घोड़े और गधों की मदद से चलाया जाता था। इसके अलावा यहूदी भी रोटी के कला मिस्र से लेकर आए हैं।

यूनानी आज से कई साल पहले रोटी बनाने की कला में आगे निकल चुके थे और कई सौ साल पहले वे 72 अलग-अलग प्रकार की रोटियां बनाया करते थे। जब लोगों ने रोटी को पसंद करना शुरू किया, तो सबसे पहले मठों में तंदूर लगाए गए थे, जिसके बाद गिरजा घरों में भी सफेद रंग की रोटी लोगों को परोसी जाने लगी। इसकी वजह से रोटी में भिन्नता को देखने हुए देश का पता लगाया जा सकता था।

फ्रांस के लोगों ने पतली और लंबी रोटियों को बनाकर लोगों को अचंभित कर दिया था। ये रोटियां खट्टी-मीठी हुआ करती थी। वहीं दूसरी ओर इटली ने भी रोटी के कई प्रकार बनाएं, जिसमें किशमिश से बनी रोटी लोगों के बीच बड़ी फेमस हुई।

भारत में भी रोटी को सम्मान

अगर हमारे देश की बात की जाए, तो रोटी की कहानी यहां भी कम दिलचस्प नहीं है। भारतीय घरों में रोटियां कई सालों से बनाती बनाई जा रही है। यह रोटियां सबसे पहले बाटी के नाम से जानी जाती थी। वहीं गरीब के घर में बनने वाली रोटियां बेहद मोटी हुआ करती थी, जिसे भौरीं और मुकनी कहा जाता था। अकबर के जमाने में भाव प्रकाश नाम का एक ग्रंथ प्रसिद्ध हुआ था, जिसमें रोटी का उल्लेख मिलता है। इस ग्रन्थ में रोटी के फायदे और नुकसान बताए गए थे।

आज भी भारत में रोटी अलग-अलग तरह की खाई जाती है, जिसमें चपाती, फुलके, पूरी और परांठे लोग बेहद पसंद करते हैं। साथ ही मैक्सिको, मध्य आयरलैंड, स्कॉटलैंड, इंग्लैंड में भी अलग-अलग तरह की रोटियां खाने का चलन है।

तो ऐसा रहा रोटी का सफर, जो आज भारतीय किचन की शान बन गई है।

मेरी आवाज़ ही पहचान है! संगीत मेरी कल्पना को पंख देता है.. किताबी कीड़ा, अडिग, जिद्दी, मां की दुलारी.. प्राणी प्रेम ऐसा कि लोग मुझे लगभग पागल समझते हैं! खाने के लिए जीनेवाली और हद दर्जे की बातूनी.. लेकिन मेरा लेखन आपको बोर नहीं करेगा..