गुरु पूर्णिमा के दिन को गुरु को समर्पित किया गया है। इस दिन का महत्त्व हिन्दू धर्म में खास तौर पर माना जाता है। इस दिन हर व्यक्ति अपने गुरु को याद करके उनकी पूजा करता है और उनसे आशीर्वाद लेता है। हिन्दू धर्म में भगवान से भी पहले गुरु को महत्त्व दिया गया है, इसका कारण है कि गुरु हमारे जीवन के अंधकार को हर कर, हमें ज्ञान की रौशनी से अवगत करवाते हैं। इसलिए आज के दिन गुरु से आशीर्वाद लेकर हम जीवन के नए लक्ष्य की प्राप्ति की ओर बढ़ते हैं।

क्या होता है लंगर में ख़ास?

भारत में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में सिख समुदाय लंगर की प्रथा को ज़िंदा रखे हुए है

गुरुनानक जी के इस लंगर में प्रसाद के रूप में लोगों को कड़ा प्रसाद दिया जाता है। यह घी में बना आटे का हलवा होता है। इसे खास तौर पर गुरूद्वारे में बांटा जाता है। इसके अलावा लंगर में रोटी, सब्ज़ी, दाल और चावल भी परोसे जाते हैं।

सिख समुदाय के लिए ख़ास गुरु पूर्णिमा

हर सम्प्रदाय में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्त्व माना गया है। सिखों में आज ही के दिन लंगर की प्रथा शुरू हुई थी। सिखों द्वारा लगाए जानेवाले लंगर में हर व्यक्ति को श्रद्धा के साथ भरपेट भोजन बांटा जाता है। सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में सिख समुदाय लंगर की प्रथा को ज़िंदा रखे हुए है। जहां भी लोगों को प्राकृतिक आपदा या फिर किसी भी आपत्ति के चलते भोजन की ज़रुरत होती है, वहां सिख समुदाय लंगर की मदद से लोगों को भोजन बांटते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं लंगर की शुरुआत गुरुनानक जी ने कैसे की थी? आज हम आपको इसी की एक कहानी सुनाने जा रहे हैं।

कैसे हुई लंगर प्रथा की शुरुआत?

गुरुनानक जी बचपन से अंधविश्वास के खिलाफ थे और वे ऊंच-नीच को नहीं मानते थे

कार्तिक महीने की पूर्णिमा के दिन मेहता कालू और तृप्ति जी को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। उनके पुत्र के चेहरे पर सूरज का तेज था, जिसे देख कर उन्हें साफ़ पता चल गया कि उनके इस पुत्र में कुछ खास है। गुरुनानक जी बचपन से अंधविश्वास के खिलाफ थे और वे ऊंच-नीच को नहीं मानते थे। वे सभी धर्म और जाति के लोगों को समान मानते थे। एक दिन गुरु नानक के पिता ने उन्हें 20 रूपए देकर कारोबार शुरू करने को कहा और इस पैसे से मुनाफ़ा कमा कर लाने को कहा। जब गुरु नानक 20 रूपए लेकर बाज़ार की ओर जा रहे थे, तब उन्होंने एक भिखारी को भूख से परेशान देखा। उन्होंने उसी 20 रुपयों से खाना खरीदकर भिखारी को भरपेट भोजन खिलाया और घर की ओर चले गए। जब उनके पिता को उन्होंने बताया कि वे 20 रुपयों से भिखारी को खाना खिला कर आए हैं, तो उनके पिता इस बात पर बेहद गुस्सा हुए। उन्होंने गुरुनानकजी से गुस्से में सवाल किया कि मुनाफा कमाने की जगह 20 रुपयों से किसी भिखारी को खाना क्यों खिलाकर आए। जिसके जवाब में गुरु नानक ने कहा किसी ज़रूरतमंद की मदद कर और किसी भूखे को खाना खिलाकर यदि उनका भला होता है, तो इससे बड़ा मुनाफा क्या हो सकता है। इस जवाब को सुन कर उनके पिता शांत हो गए। इसी तरह गुरु नानकजी ने लंगर प्रथा की शुरुआत की। आज भी श्रद्धालु इस प्रथा को दिल से मानते हैं। गुरुद्वारों में अमीर से लेकर गरीब एक ही कतार में बैठकर गुरुनानक जी के लंगर से खाना खाते हैं। यह लंगर ज़रूरतमंदों के लिए 24 घंटे चलता है। ज़ाहिर है कि आज भी गुरु नानक जी उस 20 रूपए से मुनाफ़ा कमा रहे हैं और दूसरों को भी बांट रहे हैं।

आज की गुरु पूर्णिमा क्यों है खास?

हर साल की अपेक्षा इस साल गुरु पूर्णिमा एक ख़ास अवसर पर आ रही है। आज के दिन रात 1 बजे से खग्रास चंद्रग्रहण लगने जा रहा है। यह चंद्रग्रहण अगली सुबह 5 बजे तक रहेगा। चंद्रग्रहण की वजह से इस साल 9 घंटे पहले ही सूतक लग जाएगा, इसलिए शाम 4 बजे तक ही गुरु पूर्णिमा का पूजन किया जा सकता है।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अपने गुरु को याद करते हुए श्रद्धा में लीन हो जाएं।