अभिषेक चौबे की फिल्म ‘सोनचिड़िया’ से चंबल के बागियों की गैंग बॉक्स ऑफिस पर आ रही है। यूं तो आपने हिंदी फिल्मों में डाकुओं पर कई फिल्में देखी होंगी। बैंडिट क्वीन या फिर शोले जैसी हिन्दी फिल्मों में डाकूओं की दिखाई गई दुनिया आईडल मानी जाती है, लेकिन अभिषेक चौबे की यह बागियों की दुनिया सबसे अलग है, जो आपको काफी रियलिस्टिक लगेगी। इस फ़िल्म की कहानी फ़िल्म के ही एक डायलॉग ‘ब्राह्मण, शूद्र, क्षत्रिय ओर ठाकुर यह जात सिर्फ मर्दों के लिए हैं, औरतों की कोई जात नहीं होती, उनकी जात इन सबसे छोटी होती हैं, में सिमट गई है।

फिल्म की कहानी

कहानी फिल्म के निर्देशक अभिषेक और सुदीप शर्मा ने मिल कर लिखी है

फिल्म की कहानी ऐसे बागियों की हैं, जो पुलिस से भागते हुए खुद अपनी रक्षा करना चाह रहे हैं। इन सभी बागियों का सरदार है मान सिंह यानी मनोज बाजपेयी। 1970 के दशक में को दिखाती यह फिल्म डाकुओं और उससे भागते आम लोगों की कहानी नहीं, बल्कि डाकू और पुलिस के बीच की लड़ाई की ज्यादा है। एक कर अपनी मौत को अपने सामने देखते यह डाकू पुलिस से तो भाग सकते हैं, लेकिन खुद अपनी जिंदगी और अपने आप से नहीं भाग पाते। जाने अनजाने में उनके हाथों हुई बच्चों की हत्या, उसका श्राप ओर अपने किये गए बुरे कर्मों से मुक्ति की कहानी, इस फ़िल्म को अब तक बनी डाकूओं की फिल्म से अलग बनाती हैं। यह फिल्म अपराध नहीं बल्कि अपराध के बाद की कहानी है, कर्म नहीं कर्म के फल की कहानी है। फ़िल्म कहानी हैं कुछ ऐसे बागियों की है, जिन्होंने कर्म भले ही बुरे किए हो, लेकिन वह दिल से अच्छे हैं।

फिल्म के कलाकार

फिल्म के कलाकारों को काफी रियल दिखाया गया है।

मध्य प्रदेश के जंगलों में फिल्माई गई यह कहानी मानसिंह और उसके गुंडों की गैंग लखन यानी सुशांत सिंह राजपूत, वकील यानी रणवीर शौरी की कहानी है। फिल्म में सभी किरदारों का अभिनय शानदार है। वकील ऐसा बागी है जिसका धर्म बीहड़ में ही जीना और मर जाना है, जो बदले में विश्वास रखता है और न्याय में नही। मानसिंह की मौत के बाद वो बागियो का सरदार तो बन जाता है, लेकिन अपनी गैंग को एक नही रख पाता। लखन ऐसा बागी है जिसके लिए बदले से पहले न्याय है, जो जातपात से ऊपर सोचता हैं। डाकू के रूप में सुशांत सिंह औऱ रणवीर दोनों ने ही बेहतरीन काम किया है।

भूमि पेडनेकर और उनके साथ है एक छोटी सी लड़की और यही दोनों इस फ़िल्म की सोनचिड़िया हैं। भूमि का किरदार उनके अभी तक किए गए किरदारों में सबसे बेहतरीन किरदार है। वह एक ऐसी औरत का किरदार निभा रही हैं जो बहादुर है, लेकिन खुद अपने ही घर के लोगों के अत्याचार की शिकार है, जो खुद के साथ तो अन्याय सहन कर लेती है, लेकिन जब दूसरी औरत का साथ अन्याय होता है तो जान लेने से भी नही हिचकिचाती। समाज मे औरत की स्थिति, उसकी मजबूरी को भूमि के किरदार से बयान किया गया है। मनोज बाजपेयी इन बाग़ियों के सरदार मानसिंह के किरदार में हैं , जो बच्चों ओर औरतों के लिए दिल में इज़्ज़्त रखता हैं, जो अपनी ज़रूरतों के लिए लूटपाट तो करता हैं लेकिन किसी को नुकसान पहुंचाने में विश्वास नही रखता। आशुतोष राणा फ़िल्म में पुलिस की भूमिका में है जिनका काम है मान सिंह और उसकी गैंग में शामिल हर बागी का नामो निशान मिटा देना। पुलिस वाला हो कर भी आखिर वह बागियों से ज़्यादा क्रूर क्यों है, आखिर क्यों मानसिंह के बागियों से उसे इतनी नफ़रत है? इसी बात की कड़ी इस फ़िल्म का एक अहम हिस्सा है, जो आपको फिल्म देख कर ही समझ आएगा।

फिल्म देखें या नहीं

आपको 70 के दशक का एक्शन और डाकूओं की दुनिया देखनी है तो इस फिल्म को देख सकते हैं। बुंदेलखंड और वहां की भाषा को किरदारों ने बेहतरीन रूप से याद किया है लेकिन फिल्म में इसका उपयोग बहुत ही ज्यादा है। कई बार आपको डायलॉग समझ में नहीं आते। फिल्म में गोलियों की आवाज़ के आगे फिल्म के किरदारों के इमोशन फीके पड़ जाते हैं। दूसरों के प्रति बड़ा दिल रखने वाले यह बागी खुद आपस में एक दूसरे के लिए बड़ा दिल क्यों नहीं रख पाते यह बात थोड़ी अटपटी लगती है।

फिल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे इस फिल्म से पहले इश्कियां, डेढ़ इश्कियां और उड़ता पंजाब जैसी फिल्में बना चुके हैं और इन सभी फिल्मों को काफी सराहा गया था। इस फिल्म का भी निर्देशन काफी लाजवाब है। फिल्म में जिस तरह से चंबल घाटी और जंगलों को फिल्म में दिखाया गया है उसके लिए फिल्म के सिनेमाटोग्राफर अनुज राकेश धवन के काम की दाद देनी होगी। फिल्म का संगीत फिल्म की कहानी के साथ एकदम सही बैठता है। फिल्म में कई मुद्दों जैसे स्त्री और पुरुष में होते भेदभाव, जातिवाद और अंधविश्वास को भी उठाया गया है। दरअसल फिल्म में कई तरह के इमोशन को इन बागियों के ज़रिए दिखाया गया है। कई बार ऐसा महसूस होता है कि यह फिल्म चंबल के बागियों को ग्लोरिफाई करती है।

इस फिल्म की टक्कर बॉक्स ऑफ़िस पर कार्तिक और कृति सनोन की फिल्म लुका छुप्पी से हो रही है, इसलिए फिल्म का बिज़नेस बंट जाएगा इस बात में कोई दो राय नहीं। हालांकि अभिषेक चौबे की स्टोरी टेलिंग को पसंद करने वाले लोगों को यह फिल्म पसंद आएगी। आवाज़ डॉट कॉम इस फिल्म को ढाई स्टार देता है।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।