जहां एक तरफ लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद हर तरफ मोदी की लहर है, वहीं थियेटर में भी नरेंद्र मोदी फिल्म रिलीज़ हुई है। उमंग कुमार निर्देशित यह फिल्म नरेंद्र मोदी पर एक बायोपिक है, जिसकी रिलीज़ डेट को कई बार चुनावों के चलते टाल दिया गया। हालांकि इस शुक्रवार अब जाकर यह फिल्म रिलीज़ हुई है। अगर आप मोदी भक्त है और मोदी की जिंदगी से जुड़ी बातों को जानना चाहते हैं, तो आप यह फिल्म देख सकते हैं। लेकिन ध्यान रखिएगा कि इस फिल्म में सब कुछ सच्चाई हो ऐसा बिल्कुल नहीं है।

फिल्म की कहानी


Image Credit: PM Narendra Modi

इस फिल्म की शुरुआत साल 2014 से होती है, जब मोदी बतौर प्रधानमंत्री चुनकर आते हैं यानी कि आज से 5 साल पहले। फिर यह कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है और बताती है कि कैसे गुजरात के छोटे से गांव वडनगर में चाय बेचने वाला एक लड़का प्रधानमंत्री की गद्दी तक पहुंचा। वडनगर रेलवे स्टेशन पर मोदी के पिता का चाय का स्टाल हुआ करता था और तभी से मोदी प्लेटफॉर्म पर रुकती ट्रेन में वह दौड़ कर चाय दिया करते थे। बचपन से ही चाय के स्टाल पर इकट्ठा होते लोगों के बीच होती, चाय पर चर्चा में रुचि रखने वाले मोदी को बचपन से ही किताब पढ़ने का शौक था। वह अपनी मां के बेहद करीब थे और घर के कामों (बरतन मांझने) में उनकी मदद किया करते थे। वह शुरु से ही बाकी बच्चों से अलग थे और कुछ अलग करना चाहते थे। उन्होनें अपने दोस्तों के साथ गाइड फिल्म देखी और देवआन्नद के किरदार इतना इम्प्रेस हुए कि सब कुछ छोड़ पहाड़ों पर जाकर सन्यास लेने का फैसला लिया। वहां दो साल का समय बिताया फिर वापस आकर आरएसएस को ज्वॉइन किया। रथ यात्रा, अखंड भारत यात्रा को अंजाम देने वाला मोदी कैसे दिल्ली की राजनीति का हिस्सा बने, साल 2002 के कच्छ भूकंप हो, गोधरा कांड हो ,अक्षरधाम पर हमला हो या फिर कैसे वाइब्रेट गुजरात के लिए उनका योगदान हो इस सभी बातों के साथ-साथ, एक खास मीडिया मालिक द्वारा उनके खिलाफ चलाई गई मुहिम जैसी सभी बातों को इस फिल्म में दिखाया गया है। दरअसल, यह फिल्म मोदी का ऐसा गुणगान करती है कि जहां एकतरफ आप में यह फिल्म देशभक्ति की भावना जगाती है, वहीं आपको लगने लगता है कि मानो भारतीय जनता पार्टी कुछ ना होती अगर मोदी ना होते। साफ शब्दों में कहा जाए तो यह फिल्म मोदी के कद तो इतना बड़ा कर देती है कि आपको अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे बीजेपी के नेताओं का कद काफी छोटा लगने लगता है।

किरदारों का अभिनय


Image Credit: PM Narendra Modi

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि विवेक ने इस फिल्म में अपना बेस्ट दिया है। हालांकि जब इस फिल्म का पहला लुक बाहर आया था, तभी लोग विवेक को देख कर चौंक गए थे। मोदी के किरदार को उन्होनें इतनी बखूबी से पेश किया है कि वो कही भी उसकी मिमिक्री नहीं लगता। खास कर इंटरव्ल के बाद के हिस्सों में मोदी की रैली , उनकी स्पीच और बॉडी लैंग्वेज को जिस तरह विवेक ने पर्दे पर पेश किया वह काबिल ए तारीफ है। इस किरदार के लिए उन्होनें प्रोस्थेटिक्स का भी इस्तेमाल किया है, जो उन पर एकदम परफेक्ट लगते हैं। लेकिन अपनी पूरी तरह से जी जान डालने के बावजूद यह फिल्म आपको सिर्फ और सिर्फ इसलिए नहीं लुभा पाती क्योंकि इस फिल्म की ना सिर्फ कहानी कमज़ोर है, बल्कि यह फिल्म काफी एकतरफा लगती है।

फिल्म देखें या नहीं


Image Credit: PM Narendra Modi

फिल्म का निर्देशन ‘मैरी कॉम’ औऱ ‘सरबजीत’ जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके ओमंग कुमार ने किया है। इस फिल्म को देखकर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि यह वही ओमंग कुमार है। यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ एक नेता को ग्लोरीफाई करने के लिए बनाई गई फिल्म लगती है। फिल्म में कोई और किरदार उभर कर ही नहीं आ पाता। इतना ही नहीं, जहां भी कांग्रेस और खास कर सोनिया गांधी,राहुल गांधी और मनमोहन सिंह का जिक्र आता है, उन सीन्स में इन किरदारों का सिर्फ मजाक बनाने की ही कोशिश की गई है। फिल्म में मोदी की शादी का जिस तरह से ना के बराबर जिक्र है, उसी बात से अंदाज़ा हो जाता है कि इस फिल्म में सच्चाई के साथ किस तरह से छेड़छाड़ की गई है। ज़ाहिर है कि यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ फिल्म के तौर पर आप देख सकते हैं, लेकिन यह सोच कर बिल्कुल ना देखें कि आपको इस फिल्म में 100 प्रतिशत सच्चाई देखने को मिलेगी।

आवाज़ डॉट कॉम इस फिल्म को 2 स्टार देता है और वह भी सिर्फ और सिर्फ विवेक के अभिनय और मेहनत के लिए।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।