हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में कई हिट डायलॉग देने के लिए मशहूर मिलाप ज़वेरी निर्देशित फिल्म ‘मरजावां’ का ट्रेलर जब से लांच हुआ था, तभी से इसके डायलॉग लोगों की ज़ुबान पर चढ़ चुके थे। रघु (सिद्धार्थ मल्होत्रा) का एंग्री यंग मैन का लुक हो या फिर तीन फीट के रितेश देशमुख, फिल्म के वो सभी ऐलीमेंट ट्रेलर में ही देखने को मिल रहे थे, जो एक फिल्म को मासी या हिट करार देते हैं।

70 के दशक के फ्लेवर को साकार करने का सपना देख रहे इस फिल्म के निर्देशक मिलाप ज़वेरी ने इस फिल्म की कहानी तो बेहरतीन सोची था। सिद्धार्श की इमेज भी उन्होंने अमिताभ बच्चन जैसी बनाने की कोशिश की और 3 फीट के रितेश के किरदार को दिखाकर, ड्रामा भी खुब डालने का प्रयत्न किया, लेकिन अफसोस की यह फिल्म शायद कागज़ पर सुनने में अच्छी लगी होगी, लेकिन इसे बड़े पर्दे पर लाते-लाते बहुत से लूपहोल फिल्म में नज़र आते हैं।

फिल्म की कहानी

फिल्म 135 मिनट की हैं
फिल्म 135 मिनट की हैं

कहानी साधारण है। अन्ना (नासर) टैंकर माफिया है। लावारिस रघु (सिद्धार्थ मल्होत्रा) उसे कई सालों पहले गटर के पास मिला था। रघु को गोद ले, उसे वो अपनी गेंग का ऐसा गुंडा बना देता है, जिसके नाम से हर कोई काँपता है। लम्बा, चौड़ा रघु जब किसी को मारता है तो ‘ मैं मारूंगा तो मर जाएगा, अगला जन्म लेने से डर जाएगा’ जैसे डायलॉग बोलता है और अन्ना का सारा धंधा वो ही सम्भालता है और अन्ना का बेटा रितेश देशमुख (विष्णु) 3 फीट का है, जिसकी लिए कहा जाता है ‘कमीनेपन की हाइट 3 फीट’। विष्णु को भ्रम है कि उसके पिता उससे ज़्यादा प्यार और तवज़्जों, रघु को देते हैं। रघु विष्णु से जलता है और उसके लिए कुछ ऐसे हालात पैदा कर देता है कि रघु को अपने प्यार ज़ोया (तारा सुतारिया) , जो कि गूंगी और बहरी है, उसकी जान लेनी पड़ती हैं। रघु फिर इसका बदला विष्णु से लेता है और इसी बदले की कहानी है फिल्म ‘मरजावां’।

फिल्म के किरदार

फिल्म की एडिटींग माहिर झवेरी ने की हैं
फिल्म की एडिटींग माहिर झवेरी ने की हैं

सिद्धार्थ और रितेश, दोनों के ही किरदार को मिलाप ने लार्जर देन लाईफ लिखा है। किरदारों के डायलॉग में ड्रामा इतना कूट-कूट कर भरा हुआ हैं कि कई बार फिल्म देखते हुए लगता है कि सिर्फ और सिर्फ डायलॉग को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए फिल्म बना दी गई हैं। फिल्म की कहानी कमज़ोर है। फिल्म में कई इमोश्नस का भंडार निर्देशक ने रखा है, लेकिन अफसोस की वो आपको ना तो रुला पाते हैं और ना ही आपका दिल छूं पाते हैं। फिल्म का हीरो खुद अपनी हीरोइन को अपने हाथों से मार देता हैं, ट्रेलर में इस सस्पेंस को देखकर, इसे जानने का मन ज़रुर करता हैं, लेकिन जब आप इसे फिल्म में देखते हैं, तो आपको हीरो और हीरोइन, दोनों के लिए ही कुछ महसूस नहीं होता। दरअसल, फिल्म की कमज़ोर लेखनी इसका कारण है। सिद्धार्थ की एक ख़ासियत है कि वो किसी भी तरह के रोल में आसानी से फिट हो जाते हैं। रोमांस से लेकर इस फिल्म का एंग्री यंग मैन लुक भी उन्हें सूट करता हैं, लेकिन फिल्म में गुंडा लगने के लिए जिस हाव-भाव की ज़रुरत है, उसको वो दर्शकों तक पहुंचाने में नाकामयाब रहे हैं। रितेश को विलेनगिरी सूट नहीं हुई है। एक विलेन में जिस तरह वो लोगों को इम्प्रेस कर पाए थे, वो बात इस फिल्म में नहीं। तारा सुतारिया फिल्म में खूबसूरत लगी हैं, लेकिन उनके लिए करने को बहुत कुछ नहीं। रवि किशन फिल्म में पुलिस अफ़सर हैं, लेकिन उनको बर्बाद कर दिया गया हैं।

फिल्म देखें या नहीं

फिल्म की टक्कर नवाज़ुद्दीन की मोतीचूर चकनाचूर के साथ हैं
फिल्म की टक्कर नवाज़ुद्दीन की मोतीचूर चकनाचूर के साथ हैं

फिल्म का फर्स्ट हाफ आप फिर भी देख सकते हैं, लेकिन सेकेंड हाफ में फिल्म बहुत ही बोर करती हैं। फिल्म के कई सीन्स में कोई तालमेल नहीं, ऐसा लगता है मानो फिल्म के कई सीन्स को जोड़ कर फिल्म बना दी गई हो। फिल्म की अगर कोई ख़ासियत है तो फिल्म के डायलॉग, जो सिंगल स्क्रीन क्राउड को लुभाएंगे। 70 के दशक के एंग्री यंग मैन का जो किरदार अमिताभ बच्चन निभाते थे, उसी तरह की फिल्मों की याद इस फिल्म को देखकर आ सकती हैं। लेकिन आज जब फिल्म का हीरो कहानी को माना जाता हैं, ऐसे में फिल्म की कमज़ोर कहानी के चलते यह फिल्म कितना टिक पाएगी, इस नहीं कहा जा सकता।

आवाज़ डाट कॉम इस फिल्म को 2 स्टार देता हैं।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।