विभाजन के दौर के सबसे चर्चित ओर विवादित लेखक सआदत हसन मंटो की ज़िंदगी पर बनी ये फ़िल्म 116 मिनट की है। 1930 और 1940 के दौरान मंटो की लघु कहानियां अपने बोल्ड सब्जेक्ट और उसमे दिखाई गई विभाजन की हिंसा को लेकर हमेशा चर्चा में रहती थी। खास बात है कि मंटो पर कई केस भी उस दौरान चले। मंटो की ज़िंदगी के सभी पहलुओं को नंदिता इस फ़िल्म में दिखाने की कोशिश कर रही हैं। आज़ादी के संघर्ष के दौरान बढ़ती बेरोज़गारी की वजह से देह व्यापार, वैश्याओं की ज़िंदगी पर लिखी उनकी कहानियां और उनकी किताबों के कई किस्से आप इस फिल्म में देख सकते हैं।

फ़िल्म की कहानी
फ़िल्म की कहानी की शुरुआत मंटो की कहानी के ही एक किस्से से होती है, जहां एक छोटी बच्ची अपने पिता के कहने पर खुशी खुशी देह के व्यापार के लिए तैयार है। बच्ची की मासूमियत और पिता की मजबूरी को दर्शाते फिल्म के इस पहले ही सीन में आपकी आंखे भर आती है। उसी से अंदाज़ा हो जाता है कि इस फ़िल्म में आगे मंटो की कहानी के कई ऐसे किस्से देखने को मिलेंगे। कहानी आज़ादी मिलने से पहले के भारत में शुरू होती है। मंटो यहां उस दौरान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और खासकर से बॉम्बे टॉकीज का हिस्सा थे और फिल्मों के लिए लिखते थे। भारत को आज़ादी मिली और भारत मे रहने वाले मंटो और इस्मत चुगताई जैसे मुसलमान भी खुश हुए। आज़ादी का जश्न उस दौरान बॉम्बे टॉकीज और उसकी पूरी टोली के साथ मिलकर होता है। इस जश्न में उस दौरान सभी दिग्गज हिमांशु रॉय, जो बॉम्बे टाकीज़ के मालिक थे, अशोक कुमार, श्याम चड्ढा, सुरैया जैसे लोग शामिल होते है।

फ़िल्म में मंटो ओर श्याम, जिसका किरदार ताहिर भसीन ने निभाया है, के बीच की गहरी दोस्ती दिखाई गई है। जहां विभाजन के बाद बहुत से मुसलमान पाकिस्तान चले जाते है, वहीं मंटो बोम्बें में ही रुक तो जाते है, लेकिन वो दोनों कौमो के बीच के तनाव से वाकिफ होने के कारण सहमे सहमे रहते है। उन्हें अगर कही डर नही लगता तो अपने हिन्दू दोस्त अशोक कुमार और श्याम के साथ, लेकिन श्याम एक दिन एक ऐसी बात अनजाने में कह देता है, जो मंटो को बहुत बुरी लगती है। दरअसल वह कहता है कि अगर जरूरत पड़ी तो वह मंटो को इसलिए मार सकता है क्योंकि वह मुसलमान है। अपने गहरे दोस्त के मुंह से कही गई यह बात मंटो के दिल में लग जाती है और वो अपनी जन्म भूमि और कर्म भूमि बॉम्बे छोड़ कर मुसलमानों के लिए बने देश पाकिस्लातान के लाहौर चले जाते है। लाहौर जाकर उनकी ज़िंदगी में आए उतार-चढ़ाव और उनकी लेखनी पर उठे सवाल, उनके ऊपर चले मुकदमे, उनका अकेलापन और शराब पीने की लत की वजह से परिवार से बनती दूरियां जैसे उनके जीवन के कई पहलूओं को इस फिल्म में दिखाया गया है।

उनके डायलॉग में बेबाकी झलकती हैं।

नंदिता का निर्देशन और नवाज़ का अभिनय
फ़िल्म के सेट और कहानी पर बेहतरीन रिसर्च की गई हैं। नंदिता दास निर्देशित इस फ़िल्म में मंटो का किरदार मंझे हुए कलाकार नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी निभा रहे हैं। इस बारे में कोई दो राय नहीं कि उन्होनें मंटो को बड़े पर्दे पर ज़िंदा कर दिया। जिस बेबाकी के लिये मंटो जाने जाते थे, उस बेबाकी को उतने ही बेबाक तरीके से फिल्म में पेश किया गया है। फिल्मं में मंटो के कई डायलॉग से उनकी बेबाकी झलकती हैं। जब वे अपने शहर मुंबई के बारे में ये कहते हैं-
“कोई महल में रहे या सड़क पर यहां कोई सवाल नही करता” या फिर मजहब पर कटाक्ष किया गया उनका डायलॉग, “जब मज़हब दिल से निकल कर सर पर चढ़ जाए तो टोपिया लेनी पड़ती हैं। एक हिन्दू की और एक मुसलमान की।” जैसे कई डायलॉग आपका दिल छू जाते है।

नवाज के अलावा जिस के अभिनय की तारीफ होनी चाहिए वो है रसिका दुग्गल, जिन्होनें मंटो की पत्नी साफिया का किरदार निभाया है , जो बेहतरीन है। जिस ठहराव और सादगी की जरुरत उनके किरदार के लिए होनी चाहिए, उसको उन्होनें बहुत ही बेहतरीन तरीके से पेश किया।

इस फ़िल्म से पहले गुजरात दंगों पर ‘फिरॉक’ नाम की फ़िल्म बना चुकी नांदिता दास की इस फ़िल्म का निर्देशन भी बेहद बेहतरीन है। फिल्म की एक और खास बात है कि जिस तरह से इस फिल्म में मंटो को दिखाया गया है। दरअसल मंटो से जुड़े कई ऐसी बातें इस फिल्म की यूएसपी है, जिसे कोई नहीं जानता था। निज़ी जिंदगी में मंटो जिस तरह की शख्स थे, उसकी एक झलक इस फिल्म में देखने को मिलती है।

अपनी किताबों में ही नहीं, अपनी सोच में भी वह महिलाओं को लेकर अपने समय से आगे की सोच रखने वाले एक लिबरल इंसान थे। उनकी पत्नी किसी और मर्द से हाथ मिलाए या फिर वह अपनी पत्नी की साड़ी प्रेस करे, ऐसे कई छोटे छोटे दर्शय फिल्म में है, जो उनकी औरतों के प्रति मानसिकता को दिखाता है। फिल्म में दिखाई गई झलक को देखकर ऐसा महसूस होता है कि मंटो की किताबों को पढ़कर हम जिस मंटो को जानते हैं वह उससे कहीं आगे बढ़कर है। जिस मंटो पर अश्लीलता के कई आरोप और मुकदमे चले, वो मंटो तो वाकई में इस दौरान समाज में महिलाओं की स्थिति को ही अपनी लेखनी के ज़रिए दिखा रहे थे।

फ़िल्म की कमियां और अच्छाईयां

कई फेस्टिवल में सराहना बटोर चुकी है यह फिल्म

सेकेंड हॉफ में आते आते फिल्रम काफी मजेदार हो जाती है। लाहौर में उनकी लिखी गई कहानी “ठंडा गोश्त” पर चला अश्लीलता का केस और उसी दौरान उनके निज़ी ज़िंदगी के अकेलेपन, उनकी गिरती मानसिक मनस्थिति, और खास कर के उनके हिन्दूस्तान से दूर हो जाने के दर्द को निर्देशिका ने बखूबी दिखाया है।  इस फिल्म में उर्दू भाषा के कई भारी भरकम शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिसकी वजह से यह फिल्म बहुत ही कम लोगों को समझ आएगी। फिल्म के सब्जेक्ट मंटो एक ऐसा विषय है जो साहित्य में रुचि रखने वाले लोगों को लुभा सकता है, लेकिन अगर आप उस दौर के इस लेखक के बारे में जानना चाहते हैं तो इस फिल्म को देख सकते हैं। फिल्म में ऋषि कपूर, दिव्या दत्ता, रणवीर शौरी, जावेद अख्तर, स्वानंद किरकिरे जैसे कई कलाकार छोटी छोटी लेकिन अहम भूमिका में है।

फ़िल्म की एक और खास बात है उस दौरान के भारत और खास कर के बॉम्बे शहर का सेटअप। इसका पूरा श्रेय फ़िल्म के सिनेमाटोग्राफर कार्तिक विजय औऱ आर्ट डायरेक्टर ऋतु घोष को जाता है, जिन्होंने उस दौरान के हिंदुस्तान और लाहौर का चित्रण बहुत ही खूबसूरत तरीके से किया है।
अगर आप मंटो को पढ़ चुके हैं और उन्हें बेहतर तरीके से जानना चाहते हैं, तो यह फिल्म देख सकते हैं और अगर आपने मंटो को नहीं पढ़ा है और उन्हें जानना चाहते हैं, तो भी यह फिल्म देख सकते हैं, लेकिन अगर आप साहित्य में रुचि रखते हैं, तो ही यह फिल्म देखें। एक बात का दावा लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद आसानी से किया जा सकता है कि फिल्म मंटो को देखने के बाद आप सआदत हसन मंटो को पढ़ना ज़रुर चाहेंगे।

इस फिल्म को हॉट फ्राइडे टॉक्स ढाई स्टार देता है।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।