सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता “बुंदेले हरबोलो के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी थी” इस कविता को सुनकर जिस झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की छवि आपके मन में आती है, कंगरा रनौत उस पर एकदम खरी नहीं उतरती। फिल्म में उनका सिर ना झुकाना, मर्दो से ज़्यादा बलवान उनका साहस उनको झांसी के करीब तो लाता है, लेकिन कहानी में कई लुपहोल इस किरदार को रियल होने नहीं देते। फिल्म की कहानी को देखकर ऐसा नहीं लगता कि यह वही मर्णिकर्णिका है, जिसके बारे में हमने इतिहास में पढ़ा था।

फिल्म की कहानी में कई चीज़े काल्पनिक जोड़ दी गई हैं

के वी विजेंद्र प्रसाद ने फिल्म की कहानी लिखी है

फिल्म की कहानी तो इतिहास से ही ली गई है। उनका जन्म, विवाह, अंग्रेज़ो के साथ लड़ाई और उनका शहीद हो जाने के उनसे जुड़े किस्से को कई बार हर किसी ने पढ़ा है। लेकिन फिल्म में कई जगह कहानी इतिहास से पन्नों से अलग ही कहानी दिखाई पड़ती है। रानी का खुद के गांव की बस्ती में जाकर नाचना, ग्वालियर अकेले पहुंच कर वहां के राजा का महल खुद ले लेना, फिल्म में कुछ ऐसी चीज़े है, जो इतिहास से प्रेरित ज़रुर है, लेकिन इतिहास नहीं। खास बात है कि जब झांसी की रानी जैसे किरदार पर फिल्म बनाने की बात थी, तब उस किरदार को वैसा ही दिखाना चाहिए था, मराठी परिवार में वाराणसी में जन्मी मर्णिकर्णिका को जिस तरह की भाषा और कॉस्टयूम दिया है, वह उस दौर से मेल खाता नहीं लगता।

फिल्म का निर्देशन है कमज़ोर

बतौर निर्देशक कंगना की यह पहली फिल्म है, कृष के साथ मिलकर किया है निर्देशन

फिल्म की शुरुआत अमिताभ बच्चन की आवाज़ में नेरेशन के साथ होती है। कंगना की एंट्री में ही उन्हें शेर का शिकार करते, एक निडर लेकिन नम्र दिल वाली लड़की के रुप में दिखाया है। उसके बाद नाना और तात्या के साथ तलवारबाज़ी से उनके किरदार को शुरु से ही एक वीरांग्ना के तौर पर दिखा दिया गया। लेकिन कंगना फिल्म में काफी खूबसूरत लगी है, उनकी खूबसूरती उनके किरदार पर हावी लगती है। झांसी की रानी की जब बात हो तब बात उनकी निडरता और बहादुरी की होनी चाहिए, लेकिन सुनहरे पर्दे की इस झांसी की निडरता और बहादुरी पर उसकी सुंदरता हावी होती हुई दिखती है। कंगना ने कृष के साथ मिलकर इस फिल्म का निर्देशन किया है। कंगना को यह बात याद रखनी चाहिए थी कि  क्वीन और तनु वेड्स मनु में उनको सफलता सिर्फ इसलिए मिली थी क्योंकि वह आम लड़की की कहानी थी और उस फिल्म में उन्होंने खुद को ग्लैमरस की जगह आम लड़की के तौर पर ही दिखाने की कोशिश की थी। इस फिल्म में सबसे बड़ी कमज़ोरी यह भी है कि उनके किरदार की निडरता पर उनकी सुदंरता भारी पड़ती दिखाई देती है।

फिल्म में जीशु सेनगुप्ता, डैनी, अंकिता लोखंडे, अतुल कुलकर्णी, कुलभुषण खरबंदा जैसे कई कलाकार है, लेकिन कंगना के अलावा कोई भी किरदार उभर कर नहीं आ पाया। फिल्म के लगभग हर सीन में कंगाना खुद है। यहां तक की फिल्म के फर्सट हॉफ के एक डांस में भी जहां उनकी ज़रुरत नहीं थी, फिर भी उस गीत में भी उन्होनें डांस किया है। इतना ही नहीं अंग्रेज रानी से डर कर सपने में दुर्गा मां को देखता है, उस सपने में भी कंगना ही दुर्गा मां बन उसके सपने में आती है। फिल्म में कंगना के दिखने का एक मौका नहीं छोड़ा अगर फिल्म में खुद को दिखाने का लालच उनका थोड़ा कम होता , तो शायद फिल्म के और किरदारों को उभरने का मौका मिलता और शायद कहानी इतिहास में रानी झांसी की ज़िंदगी में शामिल सभी किरदारों के साथ न्याय कर पाती।

फिल्म को देखें या नहीं

किरण देओहंस ने फिल्म की सिनेमाटोग्राफी की है

फिल्म का निर्देशन पीरियड फिल्म के हिसाब से बहुत बेहतर नही, वीएफएकस भी खास नहीं। फिल्म संजय लीला भंसाली के निर्देशन से काफी इंस्पायर लगती है। फिल्म की शुरुआत में समुद्र में तैरते जहाज़ आपको ठग्स ऑफ हिंदुस्तान की याद दिला देते है, अपने बेटे के साथ पैर फैला कर राज सिहांसन पर बैठी रानी लक्ष्मी आपको बाहुबली की माहिष्मती देवी की याद दिया देते है। फिल्म में कई जगह कंगना की डॉयलॉग डिलीवरी इतनी काफी कमज़ोर है कि आपको लगता है कि यह वह कंगना नहीं, जिन्होनें हिन्दी सिनेमा को कई बेहतरीन फिल्में दी है।

वहीं फिल्म के कुछ डॉयलाग बेहद अच्छे है, जब कंगना अंग्रेजों के सामने सिर झुकाने के लिए मना करती है, जब वह औरतों के कंधे से कंधा मिला कर लड़ाई के मैदान में लड़ने की बात करती है या फिर वह जब तात्या टोपे का किरदार निभाते अतुल कुलकर्णी से कायरता की जगह निडर होकर लड़ने की बात करती है, फिल्म के यह कुछ ऐसे द्रश्य है, जो आपको उस दौर की रानी के साहस की झलक देंगे, लेकिन फिल्म देखकर आपको एहसास होगा कि इसे और बेहतर बनाया जा सकता था।

फिल्म में प्रसुन्न जोषी का लिखा गीत मैं रहूं या ना रहूं काफी बेहतरीन है, लेकिन सुभद्रा कुमार चौहान की  जिस कविता की वजह से हर कोई रानी को जानता है, उसकी भी अगर कुछ पंक्तियों को इस फिल्म में शामिल किया जाता तो बहुत खूबसूरत होता।

आवाजॉ.कॉम इस फिल्म को 2 स्टार देता है।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।