ईरोस वान पर स्ट्रीम हो रही शॉर्ट फिल्म ‘मानसून डेट’ से ट्रांसजेंडर की कहानी को दिखाने वाली कोंकणा सेन को लोगों की काफी सराहना मिल रही हैं। दरअसल, यह शॉर्ट फिल्म ऐसी लवस्टोरी की कहानी है, जिसके बारे में हमारी फिल्मों में जिक्र ना के बराबर ही किया जाता है। ऐसी फिल्म के साथ आ रही कोंकणा, दरअसल उन अभिनेत्रियों में है, जो भले ही कम फिल्में करती हैं, लेकिन उनके किरदार अक्सर दर्शकों को याद रह जाते हैं। लाइफ इन ए मेट्रो, तलवार, लिपस्टिक अंडर माई बुर्का उनकी कुछ ऐसी फिल्में है, जो उनके किरदारों की छाप लोगों पर छोड़ गई। आज कल बन रहे सिनेमा से इत्तेफाक ना रखती कोंकणा का मानना है कि आज कल बन रहे सिनेमा से जोड़ कर खुद के देखने से बेहतर है, अंडरअचीवर, अंडरडॉग और आउटसाइडर कहलवाना।

मेरी सोच और परवरिश आज के सिनेमा से तालमेल नहीं खाती

कोंकणा सेन फिल्मकार अपर्णा सने की बेटी हैं

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साल 2002 में ‘मिस्टर एण्ड मिसेज़’ से राष्ट्रीय पुरस्कार पाकर चर्चा में आने वाली कोंकणा सेन ने हिन्दी के साथ-साथ कई बंगाली फिल्में की हैं। पेज 3, ओमकारा, ट्रेफिक सिग्नल, लाइफ इन ए मेट्रो, वेक अप सिड, तलवार और लिपस्टिक अंडर माय बुर्का जैसी बेहतरीन फिल्मों का हिस्सा रही कोंकणा की माने तो वह उन्हीं फिल्मों का हिस्सा बनी, जिनमे वह विश्वास करती हैं। कोंकणा के मुताबिक आज बन रही अधिकतर फिल्मों से वह खुद को जोड़ कर नहीं देख पाती और शायद यही कारण है कि वह फिल्में भी ज़्यादा नहीं करती। कोंकणा की माने तो , “जिस तरह कि मेरी परवरिश हुई है और जिस तरह की मेरी सोच और सेन्सिब्लिटी है। मैं सिनेमा में बन रही अधिकतर फिल्मों से खुद को जोड़ कर नहीं देख सकती, बल्कि मुझे अगर कोई आउटसाइडर, अंडरडॉग , अंडर अचीवर कहे तो वह सुनना मुझे ज्यादा बेहतर और सही लगता है क्योंकि वह मुझे अपने लिए ज़्यादा रिलेटेबल लगता है। जिस तरह की कहानियां मुझे पसंद है जो किरदार में करती हूं, उनमें मैं विश्वास रखती हूं। ऐसा नहीं है कि मैं किसी पॉपुलेरिटी कॉन्टेस्ट में भाग ले रही हूं या पॉपुलर होना चाहती है। मुझे लगता है कि पॉपुलेरिटी नंबर से नहीं आती।”

फिल्म में केवल गोरे , पतले और खूबसरत लोगों के बीच ही प्यार हो सकता है

पिछले साल कोंकणा की बतौर निर्देशक फिल्म अ डेथ इन दी गुंज को काफी सराहा गया

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ट्रांसजेंडर पर तनुजा चंद्रा निर्देशित फिल्म ‘ए मानसून डेट’ में अभिनय करने वाली कोंकणा के मुताबिक हमारी फिल्मों में केवल गोरे,पतले और खूबसूरत लोगों को ही प्यार करते दिखाया जाता हैं। 30 के बाद और खास कर मोटे लोगों को तो प्यार करने का हक ही नहीं है। सिनेमा में एक ही तरह की दिखाई जा रही प्रेम कहानियों के बारे में कोंकणा का कहना हैं, “हमारी फिल्मों को देख कर ऐसा लगता है कि सिर्फ कुछ खास उम्र के लोगों को ही प्यार हो सकता है। ऐसे लोग जवान, गोरे और एकदम पतले और देखने में बहुत खूबसूरत होते हैं। हमें दिखाया जाता है कि सिर्फ जवान लोग ही आपस में प्यार कर सकते हैं। 30 और 35 के बाद की लव स्टोरी तो हम देखते ही नहीं है। मोटे लोगों की तो लव स्टोरी होती ही नहीं है, ऐसा लगता है कि मानो उनको तो किसी से प्यार ही नहीं होता। इसलिए मैं इस बात को काफी गंभीरता से उठाना चाहती हूं कि कौन प्यार कर सकता हैं, और किससे प्यार कर सकता है। यह हमारा सिनेमा कैसे तय करेगा।”

पिछले साल ‘ए डेथ इन द गुंज’ को लिखने और निर्देशित करने वाली कोंकणा बहुत ही जल्द वेब सीरिज़ की शुरुआत भी करने जा रही हैं। गजल धारीवाल लिखी उनकी इस शॉर्ट फिल्म ‘ए मानसून डेट’ ईरोस नाव पर देखा जा सकता है।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।