तनिष्क बागची हिन्दी सिनेमा में एक ऐसा नाम है, जिन्होंने बहुत कम समय में अपनी ऐसी पहचान बना ली है कि आज उनके गीत लगभग हर हिन्दी फिल्म में सुने जा सकते हैं। फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ के गीत बन्नों तेरा स्वैगर” गीत से अपने करियर की शुरुआत करने वाले तनिष्क मानते है कि उस गीत से ही उन्हें इंडस्ट्री में पहचान मिली। बचपन से ही म्यूज़िक की ट्रेनिंग लेने वाले तनिष्क के माता पिता दोनों ही संगीत इंडस्ट्री में काम करते थे।

मेरे लिए संगीत पैसा कमाने की मशीन नहीं


तनिष्क को पहला अवार्ड फिल्म ‘कपूर एंड संस’ के गीत ‘बोलना’ के लिए मिला

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तनिष्क संगीत को साधना मानते है। तनिष्क के मुताबिक उन्हें संगीत की प्रेरणा भगवान से मिलती हैं। संगीत में नाम कमाने के इस सफर में उनके रिक्रिएट किये गए गीतों को सबसे ज़्यादा प्रशंसा मिली। अपने माता पिता को अपने काम का सबसे बड़ा क्रिटीक मानने वाले तनिष्क के मुताबिक उन्हें किसी भी काम को ना कहना पसंद नहीं और यही कारण है कि वो ओरिजिनल से साथ साथ कई पुराने गीतों को रिक्रिएट करने से नहीं हिचकिचाते। तनिष्क का कहना है, “मैं गाना इसलिए रिक्रिएट नहीं करता क्योंकि मुझे हिट होना है। मैं इसलिए रिक्रिएट करता हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि पुरानी जनरेशन को भी ये हिट गीत सुनने को मिले। मैं कोशिश करता हूं कि मैं थोड़ी बहुत ओरिजिनल गीत की धुन को भी रहने दू और कुछ उसमे नया भी एड करूं।” रिक्रिएशन को भी एक आर्ट मानने वाले तनिष्क मानते है कि ऐसे किसी भी पुराने हिट गीत को कंपोज़ करना सबसे ज़्यादा चैलेंजिंग है क्योंकि तुलना होने का डर रहता है।

बचपन में त्योहारों के दौरान नहीं मिलते थे नये कपड़े


बच्चों को संगीत की शिक्षा से पैसे कमा कर मुंबई आए

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24 घंटे में 21घंटे काम करने वाले तनिष्क दिन में सिर्फ 3 घंटा ही सोते हैं। बचपन से ही संगीत के माहौल में पले-बढ़े तनिष्क ने अपने घर में ही देखा कि उसके पेरेंट्स को संगीत से कभी पैसा नहीं मिला। तनिष्क की भी परवरिश के दौरान यही सोच थी कि उन्हें संगीत को बतौर करियर नहीं , बल्कि हॉबी के तौर पर ही रखना है। हालांकि संगीत से शोहरत कमाने वाले तनिष्क को संगीत से पैसे की आज भी उम्मीद नहीं है। वह बताते हैं, “मैं बंगाली हूं, हमारे यहां दुर्गा पूजा सबसे बड़ा त्योहार होता है। कई बार मुझे और मेरे भाई बहन को उस दिन के लिए नए कपड़े नहीं मिलते थे, तो मां भी उदास हो जाती थी। इसलिए मेरे लिए सफलता पैसा नहीं है। मिला तो ठीक, नहीं मिला तो ठीक। मैं झीरों से शुरु करने से नहीं डरता। मैंने बहुत कुछ देखा है।”

यूं तो तनिष्क पायलट बन आसमान में उड़ने की इच्छा रखते थे, लेकिन किसी कारण से वो पायलट के लिए दिया गया अपना आखिरी टेस्ट पास नहीं कर पाए और पायलट बनने से रह गए। जिसके बाद वह कोलकाता में बच्चों को संगीत सिखा कर पैसा इकट्ठा कर मुंबई आ गए और अपना संघर्ष शुरु किया। आज तनिष्क को ना पहचान की कमी है और ना ही पैसों की।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।