सेक्स जैसे टैबू मुद्दे पर बात करने को बढ़ावा देने वाली डेब्यूटेंट निर्देशक शिल्पी दास गुप्ता की फिल्म ‘खानदानी शफाखाना’ हल्की-फुल्की कॉमेडी के अंदाज़ के साथ लोगों का मनोरंजन करती हैं। दरअसल, पिछले कुछ समय से सामाजिक मुद्दों से जुड़ी फिल्मों को कॉमेडी के रंग के साथ परोसा जा रहा है। सोनाक्षी सिन्हा, वरुण शर्मा और बादशाह स्टारर यह फिल्म भी ऐसे ही मुद्दे से जुड़ी है। इस फिल्म में एक लड़की के सेक्स क्लीनिक चलाने के मुद्दे को पेश करने के लिए कही भी डबल मीनिंग या अश्लील कॉमेडी का इस्तेमाल नहीं किया गया और वही इस फिल्म की खास बात भी हैं।

फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी गौतम मेहरा ने लिखी है
फिल्म की कहानी गौतम मेहरा ने लिखी है

दरअसल, फिल्म की कहानी पंजाब के होशियारपुर की है। जहां मामाजी (कुलभूषण खरबंदा) यूनानी हकीम हैं और सेक्स क्लीनिक चलाते हैं। हालांकि होशियारपुर जैसे छोटे शहर में उनके इस सेक्स क्लीनिक चलाने को लेकर ना केवल समाज के लोग, बल्कि यूनानी हकीम भी उन्हें बार-बार नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। उनके मरने के बाद वह अपना क्लीनिक किसी और को नहीं, बल्कि अपनी भांजी बॉबी बेदी के नाम कर देते हैं। बॉबी के पिता की मृत्यु बहुत पहले हो चुकी है और घर पर मां(नादिरा बब्बर) और एक निकम्मा भाई (वरुण शर्मा) है। इस पूरे घर को चलाने की ज़िम्मेदारी बॉबी पर ही है। वह अपनी छोटी बहन की शादी चाचा से पैसे उधार ले पहले ही करवा चुकी है और भाई शादी के लिए उतावला है। मेडिकल सेल्स गर्ल के तौर पर काम करती बेबी को जब मामा का क्लीनिक मिलता है तो वो उसे चलाने के लिए मान जाती हैं। लेकिन छोटे शहर में एक लड़की का खुले आम सेक्स पर बात करना, उसके परिवार का ही उससे दूरी बना लेना जैसे कई मुद्दों के साथ इस कहानी में कई इमोश्नल ट्वीस्ट लाने की कोशिश की गई हैं।

कहानी के किरदार

फिल्म का संगीत ऐवरेज है
फिल्म का संगीत ऐवरेज है

पूरी की पूरी फिल्म सोनाक्षी के ईर्द गिर्द है। फिल्म में उन्होनें छोटी शहर की लड़की की भूमिका को बखूबी निभाया है। छोटे शहर की लड़की के चेहरे की मासूमियत, उसका रंग ढंग और मर्दों का इलाज़ करते हुए उनके साथ सेक्स के बारे में बात करते हुए होने वाली हिचक को सोनाक्षी ने बखूबी पेश किया है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि सोनाक्षी ने इस किरदार में जान डालने की पूरी कोशिश की हैं। हालांकि पंजाबी भाषा को वो भले ही पकड़ ना पाई हो, लेकिन पंजाबियों के तौर-तरीकों को में ढलने में वो कामयाब हुई हैं।

फिल्म में वरुण शर्मा ने बॉबी बेदी के भाई की भूमिका निभाई है। फिल्म में कई कॉमेडी पंचेस के साथ उन्होनें जान डाल दी है। जहां तक बादशाह की बात है, उनके हाथ काम बहुत कम काम आया है, लेकिन उन्होने इस फिल्म में एक रैपर का ही किरदार निभाया है, जिसके लिए एकदम नैचुरल एक्टिंग की ज़रुरत थी।

मामा के किरदार में कुलभूषण खरबंदा और वकील के किरदार में अनु कपूर दोनों ही बेहतरीन है। फिल्म में एक नया चेहरा आप देखते है और वो है प्रियांश जोरा का, जो फिल्म में बेहद हैंडसम लग रहे हैं। हालांकि एक्टिंग के नाम पर उनके लिए करने को बहुत कुछ नहीं था, लेकिन उन्हें जितना काम दिया गया उसके साथ उन्होने न्याय किया है।

फिल्म देखें या नहीं?

सामाजिक मुद्दें को हल्के फुल्के ढंग से पेश करने की कोशिश सराहनीय है
सामाजिक मुद्दें को हल्के फुल्के ढंग से पेश करने की कोशिश सराहनीय है

इस बात में कोई दो राय नहीं कि डेब्यूटेंट निर्देशक शिल्मी दासगुप्ता से इस फिल्म में छोटे शहर की मानसिकता को बहुत ही बेहतरीन तरीके से दिखाया है। फिल्म सिर्फ एक ही लाईन की है- ‘बात तो करो’। फिल्म सेक्स जैसे मुद्दे पर बात करने के लिए प्रेरित तो करती ही है, लेकिन इस मुद्दे को बताने की कोशिश में यह फिल्म काफी स्लो हो जाती हैं। फिल्म की कहानी आपको बांधे नहीं रखती और बीच-बीच में काफी बोर होने लगती है। फिल्म में सोनाक्षी के कहानी सुनाने के दृश्यों को आसानी से काटा जा सकता था। फिल्म की एक और कमज़ोर कड़ी है इस फिल्म का संगीत। फिल्म का कोई भी गीत आपको याद नहीं रहता। फिल्म में कुछ दृश्य ऐसे भी है, जो आपको रुला देंगे। समाज में जब कोई नया और कुछ अलग करने की कोशिश करता है, तो उसके सामने आती मुश्किलों को निर्देशक ने बेहतरीन तरीके से पेश किया है। फिल्म की सिनेमेटाेग्राफी और एडिटींग बेहद शानदार है।

हालांकि इन सबके बावजूद एक बात की प्रशंसा ज़रुर करनी चाहिए कि शिल्पी दासगुप्ता ने अपनी पहली फिल्म के तौर पर इस तरह के टैबु विषय को चुना, जो कि तारीफ के लायक है।

आवाज़ डॉट कॉम इस फिल्म को ढाई स्टार देता हैं।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।