उत्तर प्रदेश का एक गांव, जो भारत के नक़्शे में भी नहीं दिखता, हमारे ये उभरते सितारे एक ऐसे ही गांव से आए हैं। उत्तर प्रदेश में फतेहपुर डिस्ट्रिक्ट के उडुपुर नामक गांव में पले-बढे रावेन्द्र सिंह टेलीविज़न और बॉलीवुड में बतौर डीओपी अपनी पहचान बना रहे हैं। उन्होंने ‘केसरी’, ‘प्रेम रत्न धन पायो’, ‘पद्मावत’, ‘हम चार’ और ‘बायोस्कोपवाला’ जैसी कई फिल्मों के लिए फ़ोटोग्राफ़ी की है। उनकी ख़ासियत स्टिल फ़ोटोग्राफ़ी, पब्लिसिटी स्टिल्स फ़ोटोग्राफ़ी और फिल्म मैकिंग्स शूट करने में है। लेकिन एक समय था जब वो पुलिस अफसर बनना चाहते थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि वे पुलिस अफसर बनने के अपने सपने को छोड़ एक फोटोग्रफर और डीओपी बन गए? चलिए, उनके इस सफर पर एक नज़र डालते हैं

रावेन्द्र का शुरुआती जीवन

एक गरीब किसार परिवार से आए रावेन्द्र समझते है सफलता का मोल

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रावेन्द्र का बचपन बहुत सी कठिनाइयों में गुज़रा था। वो एक गरीब किसान परिवार से आते हैं। उनके पिता खेती किया करते थे। रावेन्द्र के दो भाई और भी हैं। तीनों भाई पढ़ाई में बहुत अच्छे थे और जल्द से जल्द घर संभालने में अपने पिता का हाथ बटाना चाहते थे। इसलिए रावेन्द्र के सबसे बड़े भाई अपनी पढ़ाई पूरी कर भोपाल में सीआरपीएफ में भर्ती हो गए थे। कुछ समय बाद रावेन्द्र के दूसरे बड़े भाई ने भी भोपाल में ही फ़ोटोग्राफ़ी की शुरुआत की थी। रावेन्द्र का भी सपना था कि वे एक पुलिस अफसर बने, इसलिए वे अपने सबसे बड़े भाई के पास भोपाल जाया करते थे। वहां जाकर कुछ दिन ट्रेनिंग लेने के बाद उन्हें यह एहसास हुआ कि एक पुलिस अफसर बनने के लिए जिस संयम और मेहनत की ज़रूरत होती है, वे अभी उसके लिए तैयार नहीं है। इसलिए उन्होंने अपने लिए कोई और करियर चुनने का निर्णय लिया।

फ़ोटोग्राफ़ी में बनाना चाहते थे करियर

वेडिंग फोटोग्राफी में थी रूचि

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पुलिस की नौकरी में ना जाने का निर्णय लेने के बाद उन्होंने अपने दूसरे भाई, जो कि फोटोग्राफर है, उनसे फ़ोटोग्राफ़ी से बारे में जानना शुरू कर दिया। कुछ महीनों की ट्रेनिंग के बाद ही उन्होंने फोटोग्राफी में करियर बनाने की ठान ली। वहीं से ही उनके संघर्ष की शुरुआत हो गई। भोपाल में रावेन्द्र के एक फ्लॅटमॅटे मुंबई में इसी क्षेत्र में काम किया करते थे। वे काम के लिए मुंबई जाते थे और फिर भोपाल वापस आ जाते थे। एक दिन अपनी मदद के लिए वे रावेन्द्र को अपने साथ ले गए। रावेन्द्र इस दिन का बहुत समय से इंतज़ार कर रहे थे। उस दिन शूट के दौरान रावेन्द्र ने अपने फ्लैटमेट की बहुत मदद की और असिस्ट किया। इस शूट में उन्होंने बहुत कुछ सीखा। अगली बार मुंबई में उनका आना साल 2005 में एक फोटो फेयर के लिए हुआ जहां वे और उनकी पूरी टीम इस फेयर में शामिल होने आए थे। फिर कुछ सालों बाद उन्होंने हमेशा के लिए मुंबई आकर अपना करियर बनाने के बारे में सोचा और 2008 में यहां आकर बस गए।

मुंबई आने के बाद ही उनका असली स्ट्रगल शुरू हुआ। जब वे एक साथ दो-दो काम किया करते थे। 2009 में उन्होंने फोटो एडिटर के रूप में नौकरी करना शुरू किया था, जिससे उनका गुज़ारा मुंबई जैसे शहर में हो सके। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने उस ज़माने के मशहूर डीओपी रविंद्र जैन को असिस्ट करना भी शुरु किया। रावेन्द्र का मानना है,” यदि हमें इस फील्ड में कम समय में सफलता हासिल करनी है तो, मेहनत भी दुगुनी करनी पड़ती है। कई बार मैं सुबह से लेकर शाम तक नौकरी करता था और फिर देर रात तक शूटिंग में व्यस्त रहते था। ऐसा भी बहुत बार हुआ है जब मैं बिना खाए-पिए-नहाए लगातार 60 घंटों तक काम करता था।” हालांकि एक दिन उनकी मेहनत रंग लाई और कलर्स चैनल में ‘कोई आने को है’ नामक एक सीरियल के लिए बतौर असिस्टेंट डीओपी उन्हें काम करने का मौका मिला।

अपने काम को पूजा मानते हैं रावेन्द्र

करियर में आगे बढ़ने की लिए की है बहुत मेहनत

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आज सफलता की सीढ़ीया लगातार चढ़ रहे रावेन्द्र का कहना है, “मेरा मानना है कि करियर में ऊपर उठने के लिए आप में कड़ी मेहनत और सब कुछ भुलाकर पूरी निष्ठा के साथ काम करने का जुनून होना चाहिए। अगर आप में जुनून नहीं है, तो काम करने का कोई मतलब ही नहीं बनता। यदि आपको जीवन में कुछ हासिल करना है, तो आप बहाने नहीं बना सकते कि आप इस या उस वजह से काम नहीं कर पाए आदि और तो और अपने निज़ी जीवन में भी आपको अपनी जिम्मेदारियां निभाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। आपका जुनून आपके व्यक्तित्व में झलकना चाहिए।”

रावेन्द्र आज जो भी है उसका क्रेडिट वो अपने गुरु हरी पाटीदार जी को देते है। रावेन्द्र का मानना है कि जीवन में हर छोटे-बड़े अवसर को स्वीकार कर उसके लिए पूरी सच्चाई से काम करना चाहिए। क्या पता आपकी लॉटरी कब लग जाए।

कैसे मिला बॉलीवुड में ब्रेक

फिल्मों में मिला ब्रेक

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साल 2012 में रावेन्द्र को फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ के लिए स्टिल फोटोग्राफी करने का मौक़ा मिला। शूटिंग के दौरान उन्होंने फिल्म के निर्देशक सूरज बड़जातिया जी से बहुत कुछ सीखा और पूरे क्रू के साथ एक अच्छा रिश्ता बनाया। यह एक सफल प्रोजेक्ट करने के बाद उन्हें एक के बाद एक काम के बड़े अवसर मिलने लगे। उन्होंने डैनी डेंजोंग्पा की फिल्म ‘बायोस्कोपवाला’, संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावत’, अक्षय कुमार की ‘केसरी’, नील नितिन मुकेश की १-2 ऐड फिल्म्स और भी कई बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए फोटोग्राफी करने का मौक़ा मिला। इस तरह उनकी मेहनत और स्ट्रगल रंग लाए। कुछ ही समय में निर्देशक प्रकाश झा की फिल्म ‘परिक्षा’ रिलीज़ होनेवाली है, जिसमे उन्हें बतौर असिस्टेंट डीओपी काम करने का मौक़ा मिला है।इतने सालों की मेहनत के बाद आज रावेन्द्र अपना करियर बतौर डीओपी ही बनाना चाहते हैं।

रावेन्द्र का सफर वाकई बहुत प्रेरणादायी रहा है। उन्होंने अपने इस सफर का बहुत आनंद लिया है। रावेन्द्र सभी उभरते फोटोग्राफर्स और डीओपी को भी यही सन्देश देते हैं, “अपने प्रोफेशनल तथा निज़ी जीवन में काम के प्रति और दूसरे लोगों के प्रति अपना व्यवहार, रवैया और बर्ताव हमेशा सरल और विनम्र रखें। साथ ही, ईमानदारी का साथ कभी ना छोड़ें। काम को अपनी पूजा माने और अपने काम को गंभीरता से लें।”

अपने सपनो को पूरा करने की ताक़त रखती हूँ। अभिलाषी हूं और नई चीज़ों को सीखने की इच्छुक भी। एक फ्रीलान्स एंकर। मेरी आवाज़ ही नहीं, बल्कि लेखनी भी आपके मन को छू लेगी। डांसिंग और एक्टिंग की शौक़ीन। माँ की लाड़ली और खाने की दीवानी।