अनुराग बासु को जानने वाले लोग यह बात जानते ही होंगे कि वह सिर्फ एक निर्देशक नहीं फाइटर भी है। कैंसर से फाइट करने वाला फाइटर, अपनी मायूसी से फाइट करने वाला फाइटर, फिल्म बॉक्स ऑफ़िस पर फेल भी हो क्यों ना हो जाए, फिर भी निराश ना होने वाला फाइटर। अनुराग बसु का जन्म दिन इस मायने में इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने सिर्फ गैंगस्टर, लाईफ़ इन अ….मेट्रो और जग्गा जासूस जैसी फिल्में देकर लोगों को एंटरटेन ही नहीं किया, बल्कि उनकी जिंदगी का संघर्ष भी लोगों के लिए प्रेरणा है।

आखिर क्या हुआ था जो अनुराग की ज़िंदगी प्रेरणा देती है

साल 2004 में फिल्म “तुम सा नहीं देखा” की शूटिंग के दौरान अनुराग को पता चला कि वह ल्यूकेमिया नाम के कैंसर से पीड़ित है, उन्होंने 3 साल तक इस बीमारी से लड़ाई की और 17 दिन वेंटिलेटर पर बिताएं। फिल्म की शूटिंग उन्होंने बीच में ही अधूरी छोड़ दी। मोहित सूरी और महेश भट्ट ने इस फिल्म को पूरा किया। खास बात है कि 3 साल की कैंसर की लड़ाई में अनुराग जीत गए, उन्हें अमेरिकन कैंसर सोसाइटी ने कैंसर सरवाईवर का अवार्ड भी दिया। खास बात है कि उन्हें जब बीमारी का पता चला तब डॉक्टर ने साफ साफ कह दिया था कि उनके पास सिर्फ 2 से 3 महीने का समय बचा है। तुरंत ही उनकी कीमोथैरेपी शुरू हो गई, उनके सर के बाल झड़ चुके थे, समय कम था, लेकिन इरादे मज़बूत थे।

कैसे बनी गैंगस्टर और मेट्रो

इन दोनों की फिल्मों की कहानी उन्होंने हॉस्पिटल में इलाज के दौरान लिखी

साल 2006 और साल 2007 में रिलीज़ हुई उनकी फिल्में गैंगस्टर और लाइफ इन अ मेट्रो की कहानी से ज्यादा खूबसूरत यह जानना है कि आखिर इन फिल्मों की कहानी कैसे बनी। अपनी जिंदगी और मौत से लड़ाई लड़ रहे इंसान के पास क्या कभी इतना समय होता है कि वह कुछ और सोच सके? अनुराग की इच्छा शक्ति और काम के लिए उनकी लगन इतनी मजबूत थी कि हॉस्पिटल में बिताए गए 3 साल के समय में भी उन्होंने इन फिल्मों की कहानी लिखी। उस दौरान भी उनसे मिलने आते लोगों को वह यही विश्वास के साथ बताते थे कि इन कहानियों को वहीं बनाएंगे। आखिर जो उन्होंने कहा वो कर दिखाया।

संघर्ष ने बनाया बेहतर इंसान या बेहतर इंसान का संघर्ष

अवार्ड न मिलने पर भी मायूस नहीं होते अनुराग

43 साल के अनुराग बसु सभी के दादा हैं। इंडस्ट्री में छोटे बड़े बड़े सभी उन्हें दादा कहकर बुलाते हैं।दादा का मतलब है बड़ा भाई ।अनुराग ने यह इज़्ज़त अपने काम के प्रति लगन और प्यार देकर कमाई है। अपने काम से मतलब रखने वाले अनुराग ने इंडस्ट्री में शुरुआत टीवी के साथ की थी। मर्डर जैसी फिल्मों का निर्देशन किया, रणबीर प्रियंका और इलियाना की बर्फी ,ऋतिक की काईट और रणबीर- केटरीना की जग्गा जासूस भी उनकी ही फिल्में है । भले ही उनकी फिल्में अवार्ड न बटोर पाई हो, लेकिन एक बात दावे के साथ कही जा सकती है कि उनकी फिल्मों ने हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री को पूरा किया है। उनकी फिल्मों के बिना ये अधूरी थी। साल 2012 में रिलीज़ होने वाली फिल्म बर्फी को सभी ने सराहा था। यह फिल्म कोई अवार्ड नहीं जीत पाई थी।अनुराग से पूछे जाने पर कि क्या अच्छी फिल्मों को अवार्ड ना मिलने पर मायूसी होती है? अनुराग ने अपने जवाब से सभी को चौंका दिया था। अनुराग ने कहा था, “ मुझे जब कैंसर हुआ तब मायूसी नहीं हुई तो अब क्यों होगी?” ऐसी जिंदादिल शख्सियत के मालिक है अनुराग बसु।

अपनी जड़ों से है जुड़े है अनुराग

अनुराग के दिल के बेहद करीब है सरस्वती पुजा

बंगाली परिवार में जन्मे और पले-बढ़े अनुराग अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। उनकी फिल्मों में इस कल्चर की झलक खास करके फिल्म बर्फी में देखी जा सकती है। अपनी मेहनत पर विश्वास रखने वाले अनुराग के लिए सरस्वती पूजा काफी खास है। हर साल कुछ परिवार वालों के साथ मिलकर इसका आयोजन करते हैं। अनुराग इस पूजा की तैयारियों में कुछ इतना उलझ जाते हैं कि 2 से 3 दिन तक सोते तक नहीं ।उनकी पूजा में हर साल बॉलीवुड के कई लोग शामिल होते हैं।

बार बार दिन ये आए

अनुराग के 43 साल का होने पर हमारी ढेरों शुभकामनाएं। ग्लैमर की दुनिया में आकर इसकी रोशनी में खुद को गुम कर देते लोगों के लिए अनुराग एक उदाहरण है। उन लोगों के लिए भी वो एक प्रेरणा है, जो जिंदगी की छोटी-छोटी मुश्किलों से हार मान लेते हैं। अगर अनुराग कैंसर से लड़ सकते हैं तो आप क्यों नहीं ?

अनुराग दादा “हैप्पी बर्थडे टू यू”

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।