सपना देखना गलत बात नहीं, उसके लिए मेहनत करना भी गलत बात नहीं, लेकिन क्या सपनों को पूरा करने के लिए गलत रास्ते को चुना जा सकता है? बिल्कुल नहीं! फन्ने खान देखकर आपको लगेगा कि यह फिल्म इस बात का संदेश देती है कि अपने सपनों तक पहुंचने के लिए आप किसी भी तरह की मंज़िल अपना सकते हैं। ऑस्कर नामांकित डच फिल्म एव्रीबडीज़ फेमस से इंस्पायर हो कर बनाई गई इस फिल्म से लोगों को काफी उम्मीदें थी, लेकिन यह फिल्म आपको निराश कर देती है।

फिल्म की कहानी जैसे बिना आत्मा के शरीर


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फिल्म की कहानी के कॉरीराइट लेने में फिल्म के निर्माता राकेश ओम प्रकाश मेहरा को लगभग 4 साल का समय लगा।

फिल्म की कहानी शुरू होती है फन्ने खान यानी प्रशांत (अनिल कपूर) से, जो अपनी ज़िंदगी में संगीत की दुनिया में नाम कमाना चाहता है, लेकिन नहीं कमा पाता। उसकी बेटी के पैदा होते ही वह उसका नाम लता (पीहू सैंड) रख देता है और पहली बार उसे गोद में लेते हुए कहता है कि मैं मोहम्मद रफी नहीं बन सका, लेकिन तुम्हें लता मंगेशकर ज़रूर बनाऊंगा। वहीं से शुरू होता है वो सफर, जहां पिता अपनी बेटी को एक बड़ी गायिका बनाना चाहता है। बॉडी शेमिंग जैसे मुद्दे से डील करती इस फिल्म में, फन्ने खान की बेटी में टेलेंट हैस लेकिन वह मोटी है। वह जहां भी गाने जाती है, उसकी आवाज़ से ज़्यादा उसके साइंज़ की चर्चा होती है। फन्ने खान एक आम इंसान है, टेक्सी चला कर घर का गुज़ारा करता है और बेटी की एल्बम निकालने के लिए, गुल्लक में थोड़े थोड़े पैसे जमा करता है। क्योंकि फन्ने खान ठान चुका है कि वह अपनी बेटी के सपनों को पूरा ज़रुर करेगा। मज़बूर होकर वह किडनैपिंग का रास्ता अपनाता है और रॉकस्टॉर बेबी सिंह यानी ऐश्वर्या की किडनैपिंग करता है, जिसमें उसका दोस्त राजकुमार राव भी उसके साथ शामिल हो जाता है। फिल्म के आखिर में एक कैसे फन्ने खान अपनी बेटी का सपना पूरा करता है, यहीं इस फिल्म की कहानी हैं।

ऐश्वर्या और राजकुमार की केमिस्ट्री में दम नहीं, अनिल और राजकुमार की दोस्ती भी खास नहीं


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फिल्म में किरदारों के बीच की कहानी को और बुना जाना चाहिए था

अनिल कपूर अपने आप में बेहतरीन एक्टर है, यह कहानी उन्ही की हैं। इस फिल्म में भी उन्होंने बेहतरीन एक्टिंग की है। उनकी बेटी लता और उनके बीच के कुछ दृश्य आपका दिल ज़रुर छू लेंगे, लेकिन इस रिश्ते को थोड़ा और बेहतर दिखाया जाना चाहिए था। दिव्या दत्ता फिल्म में अनिल कपूर की पत्नी के किरदार में है, जो बेहतरीन है। ऐश्वर्या और राजकुमार इस फिल्म में क्या कर रहे हैं, नहीं पता। हालांकि थोड़ी देर के लिए ही सही लेकिन राजकुमार ने अपने अभिनय की छाप ज़रुर छोड़ी है, लेकिन बतौर बेबी सिंह, ऐश्वर्या राय खूबसूरत लगी हैं, लेकिन दमदार नहीं। पीहू की यह पहली फिल्म थी, इस फिल्म के लिए उन्होनें 20 किलो वज़न बढाया, यही उनके काम के प्रति उनकी लगन को दिखाता है, अपनी पहली फिल्म के लिहाज़ से उनका अभिनय सराहनीय है।

फिल्म को संदेशों का पिटारा बना दिया गया है


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फिल्म 2घंटा 10 मिनट की है

फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोर कड़ी है इस फिल्म की कहानी। इस फिल्म में सिर्फ एक संदेश नहीं, बल्कि यह संदेशों का पिटारा है। बॉडी शेमिंग, ग्लेमर इंडस्ट्री के अंदर की कथित गंदगी, टी आर पी का खेल , लड़कियों को टॉप पर पहुंचने के लिए करने पड़ते कोम्प्रोमाइज़, मां बाप का अपने सपने बच्चों पर थोप देना, रिसेशन के कारण बढ़ती बेरोज़गारी , वार्डरोब मॉलफंक्शन…जैसे कई संदेश इस फिल्म में है। हालांकि फिल्म अपने सपनों को पूरा करने का ज़ज़्बा भी आप में जगाती हैं, लेकिन इस फिल्म में सपने को पूरा करने के लिए, जिस रास्ते को अपनाया गया है वह गलत है। ब्रेक के बाद फिल्म काफी लंबी महसूस होती हैं। दरअसल कई मुद्दों को एक साथ इस फिल्म में उठाया तो गया है, लेकिन निर्देशक अतुल मांजरेकर किसी भी मुद्दे के साथ अन्याय करने में असफल रहे हैं। फिल्म के गीत एव्रेज है, लेकिन फिल्म में गीतों की भरमार महसूस होती है।

कुल मिलाकर इस फिल्म को तभी देखा जा सकता है, जब आपका इस वीकेंड कोई और प्लान ना हो। अनिल कपूर के आप फैन हैं, तो भी इस फिल्म को देख सकते है। ऐश्वर्या के फैंस के लिए फिल्म नहीं। हॉट फ्राइ़डे टॉक्स इस फिल्म को ढाई स्टार देता हैं।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।