1861 में जन्मे बंगाली कवि रबीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी कलम से कई मानवीय भावनाओं को पन्नों पर उतारा है। आज भी उनकी लिखी कई कहानियां लोगों को प्रेरित करती है। समाज का आईना कही जानेवाली इन कहानियों पर भारतीय सिनेमा में कई फिल्में बनी है। इन फिल्मों ने बालविवाह, विधवा विवाह, छूआछूत के साथ-साथ समाज की कई समस्याओं को लोगों तक पहुंचाया हैं। उनकी सोच समय से आगे की थी। उनकी कविता के संग्रह ‘गीतांजली’ को नोबल पुरस्कार दिया गया था। भारत का राष्ट्रीय गीत ‘जन गण मन’ लिखने वाले टैगोर की आज 158 जन्म जयंती है। इस अवसर पर हम आपके लिए लेकर आए है भारतीय सिनेमा की कुछ चुनिंदा फिल्में जो टैगोर की किताब पर आधारित है।

बायोस्कोपवाला – 2018

इस फिल्म का निर्देशन देब मधेकर ने किया है

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1892 में रबिन्द्नाथ की प्रकाशित कहानी ‘काबुलीवाला’ पर 1957 में ‘काबुलीवाला’ नाम से ही बंगाली फिल्म बनाई गई, जिसके बाद 1961 में बिमल रॉय ने इस कहानी को हिन्दी में बनाया, लेकिन साल 2018 में इस फिल्म को फिर से बनाया गया और इस फिल्म का नाम था ‘बायोस्कोपवाला’। डैनी डेन्जोंगपा, गीतांजलि थापा, आदिल हुसैन, टिस्का चोपड़ा और ब्रिजेंद्र काला ने मुख्य भूमिका निभाई है। पिछले साल ही रिलीज़ हुई लगभग डेढ़ घंटे की इस फिल्म को लोगों ने बेहद सराहा था।

चोखेर बाली – 2003

यह फिल्म ‘चोखेर बाली’ नाम के उपन्यास पर ही आधारित थी

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इस नाम पर बंगाली सीरियल तो कई बन चुके है, लेकिन साल 2003 में इस उपन्यास पर ऐश्वर्या की पहली बंगाली फिल्म बनी थी, जिसका निर्देशन ऋतुपर्णो घोष ने किया था। फिल्म में ऐश्वर्या ने बिनोदनी नाम की एक विधवा औरत का किरदार निभाया था, जिसके पति की मृत्यु शादी को कुछ दिनों बाद ही हो जाती है। अकेली बिनोदनी को पहले से ही शादीशुदा महेन्द्र (प्रसन्नजीत चटर्जी) से प्यार हो जाता है, जिसकी शादी आशालता (रायमा सेन) से हो चुकी हैं। इस फिल्म में शादी के बाद दूसरे मर्द से नज़दीकियों के साथ-साथ दो महिलाओं की नज़दीकियों को भी दिखाया गया है। इस फिल्म को बंगाली फिल्म का सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला था।

नौका डूबी

इस बंगाली उपन्यास पर हिन्दी फिल्म ‘कशमकश’ बनी थी

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ऋतुपर्णो घोष निर्देशित साल 2011 में रिलीज़ हुई यह बंगाली फिल्म रिलीज़ के साथ ही काफी विवादों में आ गई थी। प्रसन्नजीत चटर्जी और जिषुसेन गुप्ता स्टार्रर इस फिल्म में राइमा और रिया सेन दोनों ही बहनों ने काम किया था। इस फिल्म का नायक एक औरत को अपनी नई नवेली दुल्हन समझकर घर तो ले आता है, लेकिन बाद में उसे एहसास होता है कि वह उसकी दुल्हन नहीं, बल्कि उसकी दुल्हन से मिलती जुलती शक्ल वाली औरत को वो गलती से घर लेकर आ गया। टैगोर के इस उपन्यास पर सुभाष घई ने भी ‘कशमकश’ नाम की हिन्दी फिल्म भी बनाई थी, लेकिन बंगाली फिल्म को ज्यादा प्रशंसा मिली।

उपहार – 1971 फिल्म

यह फिल्म टैगोर की लघु कहानी ‘सम्पति’ पर आधारित थी

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जया बच्चन और स्वरुप दत्त अभिनित इस फिल्म का निर्देशन सुधेंदू रॉय ने किया था। 1971 में रिलीज़ हुई यह फिल्म टैगोर की लघु कहानी सम्पति पर आधारित थी। इस फिल्म को भारत की और से ऑस्कर के लिए बेस्ट फॉरेन फिल्म केटेगरी के लिए चुना गया था। यह फिल्म उस दौरान इतनी सफल रही कि इस फिल्म को तेलुगू, मलयालम जैसी दक्षिण भारतीय भाषा में डब कर बनाया गया। यह फिल्म मानवी रिश्तों की खूबसूरती और गहराई को बताती है।

लेकिन – 1991

इस फिल्म का निर्देशन गुलज़ार ने किया था

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रविन्द्रनाथ टेगौर की कहानी क्षुधित पाषाण पर आधारित गुलज़ार की इस फिल्म ‘लेकिन’ को काफी सराहा गया। फिल्म में डिम्पल कपाड़िया, हेमा मालिनी और विनोद खन्ना ने अहम भूमिका निभाई थी। यह फिल्म राजस्थान में रुदाली के तौर पर काम करती महिलाओ के ईर्द गिर्द घूमती है। फिल्म का निर्माण लता मंगेशकर ने किया था। फिल्म में लताजी का गाया गीत ‘यारा सिली सिली’ आज भी लोगों को याद है और इस गीत को उस साल का सर्वश्रेष्ठ खूबसूरत गीत के पुरस्कार से नवाजा गया था।

हालांकि यह तो कुछ ही फिल्में है जो रविन्द्रनाथ टेगौर की रचनाओं से प्रेरित है। इसके अलावा भी कई कहानियां है, जो उनके साहित्य और उनकी सोच को सुनहरे परदे पर दिखाती है। अगर आप की भी कोई ऐसी पसंदीदा फिल्म हो, जो टेगौर के साहित्य पर बनी हो, तो हमें ज़रुर लिखे।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।