भारतीय सिनेमा में कई लव स्टोरीज़ को कई तरीकों से जगह मिली हैं। शैली चोपड़ा की इस फ़िल्म में भी प्यार की ऐसी कहानी है, जो हमारे समाज में मौजूद तो हैं लेकिन उसके बारे में लोग अक्सर बात नहीं करते और ना ही उसे एक्सेप्ट करते हैं। सेम जेंडर के बीच होने वाले रिश्ते और प्यार की बातें आज भी लोगों को चौंका देती हैं और इसी मुद्दे को इस फिल्म में दिखाने की कोशिश की गई है।

फिल्म की कहानी

कहानी गजल ने लिखी है, जिन्होंने फिल्म ‘करीब करीब सिंगल’ की कहानी लिखी थी

Image Credit: Mid-Day

पंजाब के मोगा में रहता एक हंसता खेलता परिवार है चौधरी का। दादी, बेटा और उसके दो बच्चों वाला यह परिवार मोगा का सबसे अमीर परिवार है, लोग चौधरी यानी अनिल कपूर को मोगा का मुकेश अंबानी भी कहते है। वह शेफ बनना चाहता था लेकिन मां के कहने पर उसने किचन छोड़ , उसने कपड़ो की फ़ैक्टरी की भागदौड़ अपने हाथ में ले ली। वह अपने बेटे बबलू और बेटी स्वीटी यानी सोनम कपूर के काफी करीब है। बेटी की शादी अच्छे घर में कराना चाहता है, लेकिन बेटी लड़के से नहीं लड़की से प्यार करती है। छोटे शहर की होने की वजह से वह यह सच्चाई अपने परिवार को नहीं बता पाती। भाई को बहन का सच पता है, लेकिन वह बहन के इस रिश्ते के खिलाफ है और उसे एक बीमारी समझता है। वह परिवार से बहन की सच्चाई छुपाने के लिए कुछ ऐसी ग़लतफ़हमियां पैदा करता है कि परिवार को लगता है कि स्वीटी साहिल मिर्ज़ा यानी राजकुमार राव से प्यार करती हैं, जो कि मुसलमान है। कैसे एक बाप अपनी बेटी की इस सच्चाई को एक्सेप्ट करता है, यहीं इस फिल्म की कहानी है।

फिल्म में अभिनय

फिल्म में लेस्बियन ट्रेक के होने को रिलीज़ तक छिपा कर रखा गया

Image Credit: uncut24x7.com

फिल्म का विषय बेहतरीन है और आज की मांग है कि इसे ज़रुर कहा जाना चाहिए था। फिल्म में एक नहीं कई अच्छे कलाकार है। अनिल कपूर का किरदार एक ऐसे बाप का है, जो अपनी मां के कहने पर शेफ बनने के अपने सपनों की कुर्बानी दे चुका है। सोनम पहली बार अपने पिता के साथ सुनहरे पर्दे पर नज़र आएंगी। फिल्म में दोनों के बीच की केमेस्ट्री और सीन्स नॉर्मल ही है। हालांकि फिल्म में अनिल कपूर और उनकी बीजी यानी मां का किरदार करती मधुमालती कपूर के बीच के सीन्स काफी मज़ेदार है। फिल्म में जिस किरदार को छिपा कर रखा गया वो है सोनम का लव इंट्रेस्ट यानी रेजिना कैसेंड्रा का। रेजिना काफी खूबसूरत लगी है। हालांकि उनके हिस्से कुछ ही सीन्स आए है, लेकिन उन्होनें अपने किरदार को बखूबी निभाया है। छत्रों के किरदार में है जूही चावला, जो कि 22 साल की शादी के बाद अपने पति से अलग हो चुकी है, एक्टींग करने का सपना रखती हैं और थियेटर के लिए केटरिंग सर्विस चलाती है। इस सब किरदारों के साथ है साहिर मिर्ज़ा यानी राजकुमार राव, जो एक बहुत बड़े प्रोड्यूसर के बेटे हो कर भी काफी स्वाभिमानी है और थियेटर के लिए कहानियां लिख कर पैसा कमाना चाहते है। फिल्म की कास्टिंग एकदम परफेक्ट है। फिल्म में अगर किसी के अभिनय की वाकई तारीफ होनी चाहिए तो वह है राजकुमार राव और अनिल कपूर की।

फिल्म देखे या नहीं

इस फिल्म का निर्देशन करने वाली शैली मंझे हुए निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा की बहन है

Image Credit: YouTube

फिल्म के विषय का चयन बेहतरीन है, लेकिन इसमें इमोशन की कमी है। फिल्म एक बेहतरीन नाटक हो सकता था, लेकिन ढाई से तीन घंटे की फिल्म नहीं। दरअसल फिल्म के फ़र्स्ट हाफ में निर्देशक इस बात का सस्पेंस रखना चाहती है कि यह एक लड़के और लड़की के बीच की नहीं, बल्कि दो लड़कियों के बीच के प्यार की कहानी है। ऐसे में यह फिल्म इंटरव्ल से पहले भटकती नज़र आती है। फिल्म में अनिल कपूर की पत्नी का कोई ज़िक्र नहीं है। राजकुमार राव के मां- बाप का ट्रेक छोटा लेकिन बेहतरीन है। जैसे थियेटर में एक एक सीन्स को परफॉर्म किया जाता है, वैसे ही यहां कई भी कई सीन्स ऐसे है, जिसके बीच कोई तालमेल नहीं बैठता।

हालांकि इन सब बातों के साथ ही जो इस फिल्म की खूबसूरती है यह है कि इस फिल्म में दो लड़कियों के बीच प्यार के नाम पर इनका रिश्ता फिज़िकली नहीं इमोशनली ज़्यादा दिखाया गया है। समाज में,परिवार में, दोस्तों के बीच जब इसे बीमारी के तौर पर देखा जाता है, तो आखिर लड़कियों पर क्या बीतती है, उनका अकेलापन उनकी मज़बूरी के पहलू को इस फिल्म में दिखाने की कोशिश की गई है। फिल्म के आखिर के सीन्स इमोश्नल है। लेकिन फिर भी बेहतर होता कि इस मुद्दे को सस्पेंस बनाने की जगह शुरुआत से ही मुद्दे की बात की जाती। ऐसे में निर्देशिका को इस मुद्दे से जुड़े और इमोशन और पहलू दिखाने का मौका मिलता।

पहली फिल्म होने के बावजूद शैली चोपड़ा का निर्देशन काफी बेहतरीन है। पंजाब के कल्चर को बेहतरीन तरीके से फिल्म में दिखाने की कोशिश की गई है। यहां तक की वहां की भाषा में भी कई शब्दों को इस तरह बोला गया है कि जैसे कोई पंजाबी हिन्दी बोलता हो।

फिल्म की कहानी गजल धालीवाल ने लिखी है। कहानी का मुद्दा काफी बेहतरीन है। फिल्म के प्रमोशन के दौरान हालांकि स्टार कास्ट ने लोगों से इस बात की अपील की थी कि फिल्म दिमाग से नहीं, दिल से देखी जानी चाहिए। अगर आप दिल से फिल्म देखने वालो में से है, तो यह फिल्म आपको ज़रुर देखनी चाहिए। आवाज.कॉम इस फिल्म को तीन स्टार देता है।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।