दूसरों के कहने पर आप लूज़र नहीं होते, बल्कि कोशिश ना करने पर और खुद से हार जाने पर आप लूज़र होते हैं। इसी बात के इर्द-गिर्द बुनी गई है नितेश तिवारी की फिल्म ‘छिछोरे’। पढ़ाई का प्रेशर, ज़िंदगी में कुछ बनने का प्रेशर हम में से हर किसी ने कभी ना कभी ज़रुर झेला है। लेकिन क्या कुछ बनने की कीमत हमारी ज़िंदगी या उसकी खुशियां हो सकती है? यह फिल्म इसी बात को सोचने के लिए मजबूर करती है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि इस फिल्म को देखकर आप में से हर कोई अपनी कॉलेज ज़िंदगी में वापस जाना चाहेगा।

फिल्म की कहानी

यह आपकी, मेरी और हर किसी की कहानी हैं। कोई भी नहीं चाहता कि उसपर लूज़र का टैग लगे, लेकिन हम में से कितने लोग इस टैग को हटाने के लिए कोशिश करते हैं। दरअसल, यह कहानी मुंबई के बेस्ट इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ चुके कुछ दोस्तों की है,जो आज अपनी ज़िंदगी में सफल है और एक ऊंचे मुकाम पर पहुंच चुके हैं। लेकिन खास बात है कि यह सभी दोस्त अपने कॉलेज के दिनों में लुज़र नाम से जाने जाते थे। कॉलेज के H4 होस्टल में रहते यह दोस्त, जिनके असली नाम किसी को नहीं पता, कॉलेज में आते ही उन्हें अन्नी (सुशांत सिंह राजपूत), सेक्सा (वरुण शर्मा), एसिड (नवीन पोलीशेट्टी), मम्मी (तुषार पांडे), डेरक (ताहिर भसीन) और बेवड़ा (सहर्ष कुमार शुक्ला) जैसे नाम मिल जाते हैं। दरअसल, यह सभी लड़के पिछले कई सालों से H3 होस्टल के लड़को से हारते आ रहे हैं, जिनका कप्तान रेगी (प्रतीक बब्बर) है। इस कहानी में शामिल है माया भी, जो इंजीनियरिंग के गर्ल्स होस्टल में रहती हैं। अन्नी और माया में प्यार हो जाता है और वो शादी कर लेते हैं।

कहानी शुरु होती है अन्नी और माया के बेटे से, जो अपने मां-बाप की तरह ही बेस्ट और स्कोलर बनना चाहता है। कॉम्पिटिटव एग्ज़ाम देने के बाद दिन-रात वो उसके रिज़ल्ट की चिंता में लगा रहता है। दरअसल, वो खुद से ज़्यादा मां-बाप की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहता है। लेकिन एग्ज़ाम में पास ना हो पाने की वजह से उसके साथ कुछ ऐसी परिस्थितियां पैदा होती है, कि उसके पिता को पूरी की पूरी कॉलेज की गैंग,जो कई सालों से मिले तक नहीं, एक साथ इकट्ठा होती है और अपने कॉलेज के दिनों में लुज़र के टैग को हटाने की अपनी कहानी अन्नी और माया के बेटे को सुनाते हैं।

कलाकारों का अभिनय

फिल्म 145 मिनट की है
फिल्म 145 मिनट की है

फिल्म में सुशांत का किरदार मुख्य है। वह अन्नी की भूमिका में है। अपनी प्रोफेशनल ज़िंदगी में सफलता पा चुका अन्नी, अपने कॉलेज की दोस्त से पत्नी बनी माया(श्रद्धा कपूर) के साथ ना ही अपनी शादी बचा पाया और ना ही बेटे को समय दे पाया। सुशांत के साथ-साथ इस फिल्म के हर कलाकार ने कॉलेज के नौजवान से लेकर 40 पार चुके आदमी का किरदार निभाया है। सुशांत ने इस फिल्म में बेहतरीन अभिनय किया है। उनके अलावा इस फिल्म में अगर कोई उभर कर आया है तो वो है सेक्सा यानी वरुण शर्मा। वरुण की कॉमिक टाइमिंग और उनकी प्रेसेंस, दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए काफी है। गुरुर से भरे कॉलेज स्टुडेंट के रुप में प्रतीक बब्बर हो या कई सालों से लूज़र टैग झेल रहे ताहिर भसीन, दोनों ही अपने किरदार के लिए एकदम सटीक थे।

दरअसल, फिल्म में एसिड, मम्मी और बेवड़ा जैसे भी कुछ किरदार है, जो आपको कॉलेज के दिनों में अपने दोस्तों की याद दिया देंगे। फिल्म में श्रद्धा कपूर ने माया का किरदार निभाया है, जो गर्ल्स होस्टल में पढ़ी और अन्नी को अपना दिल दे बैठी । फिल्म में श्रद्धा के लिए करने के कुछ ज़्यादा खास नहीं था। दरअसल, बॉयज़़ होस्टल की इस कहानी में दोस्तों ही कहानी ही इतनी दिलचस्प है कि फिल्म में हीरोइन का कम रोल दर्शकों को नहीं खलता।

फिल्म देखें या नहीं

नितेश इस फिल्म से पहले ‘चिल्लर पार्टी’ और ‘दंगल’ जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं
नितेश इस फिल्म से पहले ‘चिल्लर पार्टी’ और ‘दंगल’ जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं

फिल्म, ज़िंदगी में कुछ बनने का प्रेशर झेल रहे कई ऐसे बच्चों के लिए है, जो एक असफलता को ही अपनी ज़िंदगी का अंत मान लेते हैं। दरअसल, फिल्म का एक डायलॉग ‘ज़िंदगी में हम सक्सेस पाना चाहते है, लेकिन उसे पाने के चक्कर में हम ज़िंदगी को ही पाना भूल जाते हैं” फिल्म को खूबसूरत तरीके से बयान करता है। फिल्म का मुद्दा गंभीर ज़रुर है,लेकिन जिस सरलता से निर्देशक नितेश तिवारी ने इसे कहा है,वो क़ाबिले तारीफ है।

कॉलेज ज़िंदगी की मस्ती, कभी साथ छोड़ कर ना जाने वाले दोस्त , हम सभी की ज़िंदगी में शामिल रहे हैं। अपनी ज़िंदगी की दौड़ धूप में यह फिल्म हमें उन लम्हों में जीना सिखाती है, जिसे हम पीछे छोड़ आए हैं। फिल्म मे कई ऐसे सीन्स है, जहां दर्शक तालियां बजाते नही थकते। इसके अलावा इस फिल्म की खूबसूरत बात है कि इस फिल्म में दो कहानियां एक साथ चलती हैं, अन्नी के बेटे की ज़िंदगी कैसे अपने पिता के कॉलेज में बिताए गए पलों से प्रेरित होती है, उसे कहने का नितेश का अंदाज़ काफी खूबसूरत है।

जहां तक फिल्म की कमज़ोरी की बात है, तो फ़र्स्ट हॉफ में फिल्म थोड़ी स्लो है, लेकिन सेकेंड हॉफ में आप एक भी सीन मिस करना नहीं चाहेंगे। इसके अलावा फिल्म के गाने भी कुछ खास नहीं। फिल्म में सितारों का कॉलेज में बिताया पल और अब 40 के पार की ज़िंदगी, दोनों ही खास है। सितारों की उम्र बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए गए प्रोस्थेटिक्स कहीं कहीं काफी आर्टिफिशयल दिखते हैं।

हालांकि फिल्म में जिस तरह से कॉलेज की जिंदगी, दोस्तों में बॉन्डिंग और गंभीर मुद्दे को सरलता से पेश किया गया है, वो तारीफ के काबिल है।

आवाज़.कॉम इस फिल्म को साढ़े तीन स्टार देता है।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।