‘ठाकरे’ के नाम से दो भाषाओं में रिलीज हो रही यह फिल्म बाला साहेब ठाकरे की जिंदगी पर आधारित होगी इस बात का सभी को पता था। हालांकि यह फिल्म उन्हें पूरी तरह से बतौर हीरो पेश करती है। इस फिल्म में उनके सफर की शुरुआत उन दिनों से की गई है जब वह एक अखबार में बतौर कार्टूनिस्ट काम करते थे। तब से लेकर अप्रैल 1994 में अयोध्या मामले पर लखनऊ कोर्ट के सामने बेखौफ पेश हो आपनी बात रखते बाला साहेब ठाकरे की जिंदगी के अहम किस्से और घटनाओं को इस फिल्म में दिखाया गया है

फिल्म की कहानी


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अभिजीत पनसे ने फिल्म को लिखा है

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महाराष्ट्र की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती पार्टी शिवसेना के संस्थापक पर बनी फिल्म ठाकरे उनकी जिंदगी से जुड़े कई हिस्सों को दिखाती है। एक कार्टूनिस्ट के तौर पर मुंबई में काम करने वाले बाला साहेब किस तरह 1960 में मार्मिक नाम की अपनी मैगज़ीन शुरू करता है, उसके 6 साल बाद 1966 तक आते-आते कैसे शिव सेना नाम के संगठन की स्थापना होती है, 1970 में बजाओ पुंगी भगाओं लुंगी की शुरुआत के साथ साथ, महाराष्ट्र और मराठी लोगों के लिए काम करती इस पार्टी का दिल्ली की राजनीति में लगातार बढ़ता कद और इमरजेंसी के दौरान शिवसेना और बाला साहब की भूमिका के साथ साथ, उनके मुस्लिमों को साथ लेकर चलने के उनके विचार से हिंदूत्व की बात करने पर बाला साहेब का जीवन हो या फिर अयोध्या पर शिव सैनिकों का आंदोलन, इन सभी घटनाओं को एक के बाद एक इस फिल्म में दिखाया गया है। फिल्म की शुरुआत अप्रैल 1994 में लखनऊ कोर्ट में कटघरे में खड़े होकर बिना खौफ के अपना पक्ष रखते बाला साहब ठाकरे से होती है, जिसके बाद उनकी ज़िंदगी की घटनाओं के एक के बाद एक पक्ष को दिखाया गया है। कहा जाए तो लगभग 25 साल की उनकी और साथ में उनकी पार्टी की जर्नी को इस फिल्म में दिखाया गया है। पार्टी की स्थापना से लेकर 1995 में पहली बार पार्टी से मनोहर जोषी के मुख्यमंत्री बनने तक का जिक्र आप इस फिल्म में देख सकते हैं।

नवाज़ ने फिर मारी बाज़ी


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फिल्म में कई छोटे बड़े कलाकार है।

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फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बाला साहब ठाकरे की भूमिका निभाई है। नवाजुद्दीन एक बेहतरीन एक्टर है उन्होंने कई बार इस बात को कहा था कि वह इस फिल्म में मिमिक्री ना करते हुए, अपने अंदाज़ में शिवसेना सुप्रीमों को पेश करने की कोशिश करेंगे। नवाज ने इस फिल्म के साथ कुछ इसी तरह से किया है। वह इस रोल में कुछ इस कदर घुस गए हैं कि एक क्षण के लिए आप भी दुविधा में पड़ जाते हैं कि क्या यह नवाजुद्दीन सिद्दीकी है या खुद बाला साहब ठाकरे। दशहरा के दौरान होती बाला साहेब की रैली में उनका अंदाज़ हो या फिर दोनों हाथ जोड़कर भीड़ को सलाम करना हो, ऐसी कई छोटी-छोटी बाला साहब की बातों को नवाज़ ने अपने किरदार में कुछ इस तरह से ढाला है, जिसकी वजह से वह काफी रियलिस्टिक जान पड़ता है।

फिल्म में एक और अहम किरदार है अमृता राव का, जो बाला साहेब की पत्नी मीना ताई का किरदार निभा रही है। उन्होंने एक घरेलू महिला की भूमिका निभाई है, जो अपने पति का साथ देती है। अपने इस किरदार में वह बेहद अच्छी लगी है और अपने किरदार के साथ उन्होंने न्याय भी किया है।

फिल्म को देखें या नहीं


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फिल्म में ठाकरे परिवार का किसी और सदस्य को इतनी गहराई से नहीं दिखाया गया।

Image Credit: Bangladesh Post

अगर आपको राजनीति में रुचि नहीं है, तो भी अगर आप इस फिल्म को देखते है, तो भी आपको यह फिल्म बोर नहीं करेगी। फिल्म में राजनीति से ज़्यादा, क्यों कोई राजनेता बनता है और क्यों उसे आवाज़ उठानी पड़ती , इस बात को दिखाया गया है। महाराष्ट्र की राजनीति में रुचि रखने वाले लोग शायद इस फिल्म में दिखाई गई सभी घटनाओं के बारे में पहले से ही जानते होंगे। यह फिल्म बाला साहेब की निज़ी ज़िंदगी वाले पहलू को इतनी उजागर नहीं करती, जितनी दर्शकों को उम्मीद होगी। हालांकि कुठ जगह पर उनके पिता के साथ उनकी नज़दीकी के अलावा उनके निजी पहलूओं को निर्देशक ने ना दिखाना ही बेहतर समधा।

इसके अलावा अभिजीत पनसे निर्देशित इस फिल्म में सभी घटनाएं बाला साहब के नजरिएं से ही दिखाने की कोशिश की गई है। इसलिए इस फिल्म में वह इतने ग्लोरिफाई हो जाते हैं कि देखने वाला दर्शक उन्हें एक ऐसा हीरो मानने लगता है, जिसने कभी कोई गलती ना की हो। हालांकि फिल्म में हर पक्ष के पहलुओं को दिखाया जाना बेहद ज़रूरी था। कहते है कि जितनी बड़ी बुराई होती है, अच्छाई उतनी ही बड़ी महसूस होने लगती है। लेकिन यह फिल्म एक ही पक्ष दिखाई गई कहानी लगती है।

लेकिन फिल्म के डायलॉग जैसे की जब बाल (बाला साहेब) मुंबई चलाता है तो दिल्ली भी जल कर लाल हो जाती हैं’ जैसे कई ऐसे सीन्स और डायलॉग है, जिस पर दर्शक तालियां बजाते है।

हालांकि यह साल चुनावों का साल है, ऐसे में यह फिल्म मराठी लोगों को बहुत हद तक प्रभावित करेगी इस बात में कोई दो राय नहीं। लेकिन फिल्म को सिर्फ अगर फिल्म के तौर पर देखा जाए, तो यह फिल्म लोगों को पसंद आएगी। आप एक बार यह फिल्म देख सकते हैं।

आवाज. कॉम इस फिल्म को ढाई स्टार देता है

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।