इस बात में कोई दो राय नहीं कि अमिताभ बच्चन का विकेट कोई नहीं गिरा सकता। वह 75 साल के हों या 102 साल के, वह हमेशा ही नॉट आउट रहेंगे । यह कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म के निर्देशक उमेश शुक्ला अपनी टीम यानि अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर के साथ मिलकर बॉक्स ऑफ़िस पर सभी के छक्के छुड़ा देंगे।

फिल्म की कहानी

अमिताभ और ऋषि कपूर 26 साल बाद एक साथ काम रहे थे।
अमिताभ और ऋषि कपूर 26 साल बाद एक साथ काम रहे थे।

यह कहानी है 102 साल के एक बाप दत्तात्रेय वखारिया (अमिताभ बच्चन) की जो अपने 75 साल के बेटे बाबूलाल वखारिया( ऋषि कपूर) को फिर से बड़ा करता है, उसे खुल कर जीना सिखाता है। बाबूलाल खुद को बूढ़ा समझता है। हर रोज़ डॉक्टर के पास जाता है, खुद को छोटी-छोटी बातें याद दिलाए रखने के लिए घड़ी में अलार्म लगाता है और अपनी पुरानी चीजों (यादों) से बाहर ही नहीं निकलना चाहता। उसकी आंखों मे चमक सिर्फ विदेश मेजाकर बस चुके उसके बेटे अमोल के नाम से ही आती है। दरअसल बुढ़ापे को उसने अपने दिमाग में फिट करके रख लिया है।वहीं उसका बाप दत्तात्रेय 102 साल का है, लेकिन जिंदगी को खुलकर जीता है। उसकी आंखों में चमक है। उसका मानना है जब तक इंसान ज़िदा है उसे मरना नहीं चाहिए, यानि अपनी इच्छाओं और जिज्ञासाओं को मारना नहीं चाहिए। दतात्रेय अपने बेटे बाबूलाल को फिर से बच्चे जैसा यानि ज़िदादिल बनाने के लिए उसे वृद्धाश्रमव भेजने की झूठी योजना बनाता है और वृद्धाश्रम ना भेजे जाने की एवज में कुछ शर्तें रखता है, जिसे पूरा करते-करते उसके बेटे यानि बाबूलाल की आंखों में फिर से चमक आ जाती है।

क्या है ख़ास?

फिल्म सौम्य जोषी के गुजराती प्ले पर आधारित है।
फिल्म सौम्य जोषी के गुजराती प्ले पर आधारित है।

अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर और धीरू का किरदार निभा रहे जिमीत त्रिवेदी की एक्टिंग इस फिल्म का प्लस पॉइंट है। इन तीनों की आपस की केमिस्ट्री इतनी मज़ेदार है कि आप एक भी सीन मिस करना नहीं चाहेंगे। लगभग 2 घंटों की इस फिल्म में आपको कहीं भी बोरियत महसूस नहीं होगी। मिस्टर बच्चन ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि वह एक्टिकी खान हैंऔर उन्हें हिंदी सिनेमा का महानायक क्यों कहा जाता है। बाबूलाल के किरदार में ऋषि कपूर ने सभी का दिल जीत लिया। बाप-बेटे के तौर पर उनकी केमिस्ट्री और आपस में डायलॉग काफी मज़ेदार है। धीरू के किरदार में जिमित त्रिवेदी का काम शानदार है। फिल्मों में समय-समय पर चलते पुराने गीत सिर्फ गीत ही नहीं फिल्म की कहानी को आगे ले जाने में मदद करते हैं।

क्या फिल्म में ग्लैमर फेक्टर मिसिंग है?

ऋषि कपूर के किरदार के लिए पहले परेश रावल को चुना गया था
ऋषि कपूर के किरदार के लिए पहले परेश रावल को चुना गया था

जी नहीं, फिल्म में चंद्रिका है, जिसे सब से छिपा कर रखा गया है। वह कई सीन्स में मौजूद है भी और नहीं भी। फिल्म क्या यह किरदार ऐसा है जिसे आप फिल्म देखने के बाद बेहतर रूप से समझ पाएंगे और उससे भी प्यार कर बैठेंगे।

फिल्म में क्या अच्छा नहीं है?

लाख ढूंढने पर भी शायद ही इसमें कोई गलती निकाली जा सके। लेकिन फिल्म में कुछ चीजें मिसिंग ज़रूर हैं, जो अगर होती तो बहुत ही अच्छा होता। जैसे ऋषि कपूर 75 साल के नहीं लगते और कई जगहों पर जब फिल्म के किरदार रोते हैं तो आपको रोना नहीं आता।

क्या फिल्म देखनी चाहिए?

ज़रूर – मेरे एक तरफ बगल में 10 साल का बच्चा और एक तरफ 70 साल के अंकल बैठे थे। फिल्म के दौरान और आखिर में दोनों के ठहाके और तालियों से एक बात तो ज़ाहिर हो गई है कि 102 नॉट आउट दो बूढ़ों की कहानी ज़रूर है, लेकिन इसे बचपन, जवानी और बुढ़ापे में देखा जा सकता है। फिल्म को 4 स्टार मिलते हैं। हम यही कहेंगे कि IPL के चौके और छक्के छोड़कर इस फिल्म के किरदारों के चौके छक्के आप ज़रूर देखिए। दावा है कि आप कह उठेंगे ‘वेल प्लेड 102 नॉट आउट टीम।’

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।