आर्टिकल 15 समानता के अधिकार पर बनी फिल्म है, एक ऐसी कहानी जिसे लोगों तक पहुंचाना बहुत ज़रूरी है। हर बार कुछ नया करने की कोशिश करते आयुष्मान अपनी इस फिल्म से समाज के उस मुद्दे को उठाना चाहते है, जिसके बारे में शहर मे रहती जनता तो अनजान है ही, लेकिन गांवों में रहते लोग इसके शिकार होते हुए भी मुंह नहीं खोलते। अनुभव सिन्हा निर्देशित यह फिल्म उनकी पिछली फिल्म ‘मुल्क’ जैसी ही है, जिसे देखने के बाद आप बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो जाएंगे। यह फिल्म आपकी आंखें खोलने के लिए काफी है।

फिल्म की कहानी

अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी ने मिल कर इस फिल्म की कहानी लिखी है।

पोस्टिंग के लिए उत्तर प्रदेश के लालगांव में उच्च पुलिस आयुक्त बन कर आए, अयान रंजन (आयुष्मान खुराना) के थाने की हद में दो नाबालिग दलित लड़कियां की लाश पेड़ से टंगी हुई मिलती है और एक गायब हो जाती हैं। इसी केस की जांच करते हुए उसे इस बात का पता चलता है कि जिस भारत पर वह गर्व करता है, वहां कई जगहों पर लोग जाति और धर्म के नाम पर बंटे हुए हैं। यूरोप से पढ़ाई करके लौटा अयान रंजन का सामना जब इस सच्चाई से होता है, तो वह उसके खिलाफ जंग छेड़ देता है। उसकी इस जंग में कई ऐसी सच्चाइयों सामने आएंगी जो दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देगी। आज़ादी के इतने सालों बाद भी जिस संविधान को डॉ बाबा साहेब आंबेडकर ने 69 साल पहले बनाया था, उसके आर्टिकल 15 मे समानता का अधिकार तो केवल किताबों में ही सिमट कर रह गया है। एक वर्ग विशेष को उसकी औकात दिखाने के लिए लड़कियों के साथ होता सामूहिक बलात्कार वाकई में हमारे समाज की सच्चाई है,  जिसे इस फिल्म के माध्यम से दिखाया गया है।

फिल्म के किरदार

फिल्म की शूटिंग 30 दिन में ही लखनऊ में पूरी कर ली गई थी

फिल्म का मुख्य किरदार आयुष्मान का है, जो पुलिस अफसर की भूमिका निभा रहा है। दरअसल, आयुष्मान ने एक रियलिस्टिक पुलिस अफसर की भूमिका निभाई है। बाकी हिन्दी फिल्मों की तरह मार-धाड़ और एक्शन से दूर, उनका किरदार इस तरह की परिस्थिति में उलझा पुलिस अफ़सर क्या करेगा, उसे दिखाता है। स्मार्ट, हैंडसम और अपने देश को प्यार करने वाले पुलिस अफसर का किरदार निभाते आयुष्मान ने अपने इस किरदार को कही भी लार्जर देन लाइफ ना बनाते हुए काफी रियलिस्टिक रखा है।

फिल्म में उनकी प्रेमिका अदिति (ईशा तलवार) , दलित लड़की गौरा (सयानी गुप्ता) जैसे भी कई किरदार है, जो कहानी को आगे बढ़ाते हैं।

फिल्म में दलित नेता का किरदार मोहम्मद जीशान अयूब ने निभाया है। फिल्म में उनका किरदार छोटा ही सही लेकिन बहुत दमदार है। पढ़ाई में अच्छा होने के कारण वह अपनी ज़िंदगी में बहुत  कुछ हासिल कर सकता है, लेकिन उसकी लड़ाई अपने और अपने जैसे कई लोगों को उस समानता के अधिकार को दिलाने की है, जिसे 69 साल पहले ही हमारे संविधान में शामिल कर तो लिया गया था, लेकिन वह सिर्फ और सिर्फ उस किताब में सिमट कर रह गया।

फिल्म देखें या नहीं

फिल्म के निर्देशक ने मुल्क जैसी फिल्म बनाई है

हर फिल्म मनोरंजन के लिए नहीं हो सकती। यह फिल्म आपको आपके समाज की ऐसी कई सच्चाइयों से रुबरु कराएंगी , जिसे आप नहीं जानते होंगे। माइनोरिटि के नाम पर जिन लोगों को समाज में कई बार अछूत समझा जाता है, वह हमारे समाज का 70%  हिस्सा है। जातिवाद और धर्म के नाम पर हो रहे बंटवारे में कई बार वो लोग भी शामिल होते हैं, जो खुद उसी जाति और वर्ग का हिस्सा है। कई ऐसी बातें है, जो आप इस फिल्म को देख कर समझ पाएंगे। फिल्म की सिनेमाटोग्राफी बेहद खूबसूरत है। फिल्म में अयान रंजन की प्रेमिका ज़रुर है,लेकिन हीरो और हीरोइन के रोमांस को दिखाकर फिल्म को मुद्दे से भटकाने की कोशिश नहीं की गई हैं। फिल्म के डायलॉग इतने सटीक और कड़वी सच्चाईयों से दर्शकों का सामना कराते है कि थियेटर से निकलने के बावजूद वह आपको याद रहते हैं। जैसे जीशान का डायलॉग ‘ये उस किताब को नहीं चलने देते जिसकी शपथ लेते हैं।’ इस पर आयुष्मान कहते हैं ‘यही तो लड़ाई है उस किताब की चलानी पड़ेगी उसी से चलेगा ये देश।’ या फिर उन्ही का डायलॉग ‘मैं और तुम इन्हें दिखाई ही नहीं देते हैं। हम कभी हरिजन हो जाते हैं तो कभी बहुजन हो जाते हैं। बस जन नहीं बन पा रहे कि जन गण मन में हमारी भी गिनती हो जाए।’ इस बात को दर्शाने के लिए काफी है कि आखिर फिल्म और उसका असली मुद्दा क्या हैं।

दरअसल, जहां कई सितारे आज भी करोड़ो की फीस लेकर, करोड़ो की लागत से बनी लार्जर देन लाइफ फिल्में और अनरियलिस्टिक किरदारों को करने में विश्वास रखते हैं, वहीं आयुष्मान जैसे सितारे का और अनुभव सिन्हा जैसे निर्देशक का यह प्रयास इसलिए भी सराहनीय है कि क्योंकि ऐसी फिल्में हमारे समाज की सच्चाई से दर्शकों को रुबरु करवाती  हैं। इस फिल्म को दर्शक मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि इस बात के लिए ज़रुर देखने जाए कि आखिर दलित- ब्राहमण – क्षत्रिय और शुद्र जैसे वर्गों में बंटे इस समाज में कैसे कई बेकसूर यूं ही अपनी जान गंवा देते हैं।

आवाज़ डॉट कॉम इस फिल्म को 4 स्टार देता हैं।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।