बॉम्बेरिया शब्द सुनने में अजीब लगता है, लेकिन फिल्म देखने के बाद आप को ये शब्द अजीब नहीं लगेगा। हालांकि आपको लगेगा कि पीया सुकन्या निर्देशित इस फिल्म का इससे बेहतर टाइटल हो ही नहीं सकता था। मनोरंजन और कॉमेडी के साथ यह फिल्म आपको एक गहरा संदेश देती हैं। मुंबई में रहना वाला हर कोई इस फिल्म के साथ खुद को जोड़ कर देख सकता है।

फिल्म की कहानी

यह फिल्म एक कॉमेडी मिस्ट्री है

फिल्म की कहानी शुरु होती है एक न्यूज़ रुम से जहां एक मंत्री के खिलाफ एक ग्वाह को पेश किए जाने की बात चल रही हैं। जिसके बाद होती है मेघना यानी राधिका आप्टे की एन्ट्री। उनके साथ दौड़ भाग में कुछ ऐसा होता है कि उनका फोन कोई छीन कर चला जाता है और फिर उस फोन के चक्कर में वो एक के बाद एक ऐसे उलझती चली जाती है कि निकल ही नहीं पाती। उनको फोन छीनने वाला आंगडिया यानी कोरियर वाला ( सिद्धांत कपूर) , उनकी मदद करने वाला अभिषेक (अक्षय ओबेराय) और फिर सुपर स्टार करण कपूर (रवि किशन) जैसे इस फिल्म में कई किरदार है, लेकिन सभी की कड़िया इस फोन और मेघना से आकर जुड़ जाती हैं। पीया की यह फिल्म एक कॉमेडी मिस्ट्री है और एक गहरा संदेश देती है। दरअसल भारत में कई चश्मदीद गवाहों के होस्टाइल हो जाने की वजह से कई लोगों को न्याय नहीं मिल पाता, यह फिल्म हल्के फुल्के अंदाज़ में ऐसे ही लोगों को सुरक्षा मुहैया कराने की बात करती है।

किरदारों का अभिनय

फिल्म में छोटे बड़े 54 सितारें हैं

फिल्म में 54 किरदार है। लेकिन मुख्य किरदारों में राधिका आप्टे, अक्षय ओबेराय, आदिल हुसैन ( पंडया राजनेता) सिद्धांत कपूर, रवि किशन और अमित सयाल है, जिन्होनें सीआईडी गुजराल की भूमिका निभाई है। 108 मिनट की इस फिल्म में ऐसा नहीं कि किसी एक का काम मुख्य हो। फिल्म की कहानी को फिल्म की निर्देशिका पीया ने आरती बाग्ड़ी और अपने पति माइकल वार्ड के साथ मिल कर लिखा है। फिल्म के किरदारों की कास्टिंग काफी अच्छी है। हर अभिनेता अपने किरदार के साथ न्याय करता नज़र आता है।

फिल्म देखें या नहीं

फिल्म की कहानी कहने का अंदाज़ है नया

फिल्म को मुंबई की रियल लोकेशन में शूट किया गया है। मुंबई जैसे शहर की हड़बड़ाहट इस फिल्म में देखने को मिलती है। फिल्म की कहानी लिखने का ढंग नया है इस बात में कोई दो राय नहीं। लेकिन फिल्म की कहानी काफी लंबे समय तक समझ ही नहीं आती। गुनाह, गुनेहगार, होस्टाइल हो जाना, ग्वाह की सुरक्षा जैसे मुद्दे शायद ही आम जनता समझ सके। फिल्म के फ़र्स्ट हाफ तक यही समझ नहीं आता कि आखिर फिल्म किस ट्रेक पर चल रही हैं। लेकिन अगर आप आखिर तक रुक गए तो आपको यह फिल्म ज़रुर समझ आएगी। फिल्म में जिस तरह सभी किरदारों के स्टोरी ट्रेक को जोड़ा गया है वह काफी क़ाबिल ए तारीफ है। फिल्म की एडिटिंग के साथ साथ कार्तिक गणेश की सिनेमाटोग्राफी अच्छी है। हालांकि फिल्म छोटी है, लेकिन फिर भी कई जगह पर बोर करती है। फिल्म का असली मजा इंटरवल के बाद से शुरु होता है, जब धीरे धीरे फिल्म की कहानी समझ आने लगती है। लेकिन डर इस बात का है कि क्या आम दर्शक में इतना सब्र है कि वो आखिर तक रुके।

अगर आपको नए सिनेमा को देखने का शौक है। आप सिनेमा में धीरे धीरे हो रहे बदलाव की सराहना करते है, तो आप इस फिल्म को देख सकते हैं। लेकिन यह फिल्म अर्बन दर्शकों के लिए है और ऐसे दर्शकों के पास इस तरह का और इससे बेहतर सिनेमा डिजीटल प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध है।

इस फिल्म को आवाज़ ढाई स्टार देता है।

HFT हिन्दी की एडिटर, मनमौजी, हठी लेकिन मेहनती..उड़ नही सकती लेकिन मेरी कल्पनाशक्ति को उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपने महिला होने पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है। लिखना मेरा शौक है। लिखने के अलावा बेटे के साथ गप्पे मारना और खेलना मुझे बेहद पसंद है।